लापता महिलाएं और बच्चियां
छत्तीसगढ़ में महिलाओं और मासूम बच्चियों की गुमशुदगी का आंकड़ा चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। राज्य में हर दिन औसतन 30 महिलाएं और बच्चियां गायब हो रही हैं, जिनमें 10 से 12 नाबालिग लड़कियां शामिल हैं। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य से 36,662 महिलाएं और बच्चियां लापता हो चुकी हैं, जिनमें से 7,188 का अब तक कोई पता नहीं चल सका है। यह स्थिति राज्य के पुलिस-प्रशासन और सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
1. लापता होने वाले बच्चों का आंकड़ा
- बच्चों की गुमशुदगी: महिला और बाल विकास मंत्रालय की मिसिंग चिल्ड्रन रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच राज्य से 982 बच्चे लापता हो गए, जिनमें से 400 का अब तक कोई पता नहीं चला।
- बालिकाओं का अधिक लापता होना: चौंकाने वाली बात यह है कि लापता होने वाली लड़कियां 14-17 वर्ष की उम्र की हैं, जिनका शिकार मानव तस्करी और बाल श्रम के कारण हो रहा है।
2. मानव तस्करी के बढ़ते मामले
- मानव तस्करी और बच्चों का शोषण: राज्य के सरगुजा, जशपुर, कोरबा, बलरामपुर, और बस्तर जैसे सीमावर्ती जिलों में मानव तस्करी की घटनाएं अधिक हो रही हैं। बेरोजगारी और प्रवासन की प्रवृत्ति इन क्षेत्रों में अधिक है, जिससे तस्कर आसानी से मासूमों को बहला-फुसलाकर तस्करी के लिए ले जा रहे हैं।
- आदिवासी महिलाओं और बच्चियों का शिकार: खासकर आदिवासी वर्ग की महिलाओं और बच्चियों को रोजगार के बहाने या फिर जबरन शादी के जाल में फंसाकर तस्करी की जाती है। इसके बाद उन्हें दूसरे राज्यों में घरेलू काम, जबरन श्रम या यौन शोषण के लिए भेजा जाता है।
3. पुलिस की विफलता और प्रशासनिक संकट
- अमले की कमी: पुलिस विभाग में 8,637 पद खाली हैं, जिनमें इंस्पेक्टर से लेकर कांस्टेबल तक शामिल हैं। यह कमी ग्रामीण इलाकों में पुलिस के नेटवर्क को कमजोर बना रही है, जिससे मानव तस्करी के मामलों में प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं हो पा रही।
- लापता होने से रोकने के उपाय: पुलिस अधिकारियों के अनुसार, राज्य में लापता होने वाली महिलाओं में बड़ी संख्या आदिवासी वर्ग की है। हालांकि, इनमें से अधिकांश को बरामद कर लिया गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन्हें लापता होने से कैसे रोका जाए?
4. मानव तस्करी का नया चेहरा: धोखा और विश्वास का जाल
- तस्करी की नई रणनीतियां: मानव तस्कर अब सीधे अपहरण के बजाय धोखे और विश्वास का जाल बुनकर बच्चों को निशाना बना रहे हैं। तस्कर शहरों में बच्चों और उनके परिवारों को बेहतर नौकरी, शिक्षा और सुनहरे भविष्य का लालच देकर ठग रहे हैं।
- सोशल मीडिया का इस्तेमाल: विशेष रूप से 14-17 वर्ष की किशोरियों को इंटरनेट और प्रेम जाल में फंसाकर देह व्यापार के लिए तस्करी की जा रही है।
5. जागरूकता और समाधान की आवश्यकता
- बचपन बचाओ आंदोलन: बचपन बचाओ आंदोलन के पूर्व राज्य समन्वय और नंगे पांव सत्याग्रह के संयोजक राजेश सिंह सिसोदिया का कहना है कि मानव तस्करी प्राचीन दासता का आधुनिक चेहरा है। अब यह यौन शोषण और चकाचौंध के लालच की ओर बढ़ चुका है, जिसमें महिलाएं और बच्चे इसके प्रमुख शिकार बन रहे हैं।
- प्रशासनिक कार्रवाई: राज्य सरकार और प्रशासन को तत्काल प्रभाव से इस संकट से निपटने के लिए योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जागरूकता अभियानों और खुफिया तंत्र को मजबूत करके इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।