कुछ सालों पहले ईसाई-बहुल था लेबनान, बेरूत को कहा गया पूर्व का पेरिस, कब और कैसे बना मुस्लिम देश?

हिजबुल्लाह समेत कई चरमपंथी गुटों का गढ़ लेबनान कुछ दशक पहले ईसाई देश हुआ करता था. ये ज्यादा पुरानी बात नहीं. यहां तक कि वहां की संसद में भी लगभग 60 फीसदी जगह क्रिश्चियन लीडरों के लिए सुरक्षित थी. फिर यहां कुछ ऐसे बदलाव हुए कि मुस्लिम मेजोरिटी हो गई. यहां तक कि अब लेबनान एक इस्लामिक मुल्क है. जानें, कुछ ही सालों में यहां क्या बदला. 

हाल में लेबनान में हुए इजरायली हमले में हिजबुल्लाह के कमांडर नसरल्लाह समेत कई बड़े लीडर मारे गए. इसके बाद से पूरे देश में तबाही मची हुई है. चरमपंथी इस्लामिक संगठनों का होमलैंड बन चुके लेबनान को उसके कट्टरपंथ और यहूदियों-ईसाइयों से नफरत के लिए जाना जाता है. लेकिन ज्यादा नहीं, लगभग पचास साल पहले ये देश खुद क्रिश्चियन मेजोरिटी हुआ करता था, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से भी कम थी. 

बीते सप्ताह इजरायली हमले में हिजबुल्लाह चीफ हसन नसरल्लाह समेत कई लीडर मारे जा चुके. हिजबुल्लाह एक चरमपंथी गुट है, जिसकी पकड़ संसद और सरकार दोनों जगह है. फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर ये इजरायल पर लगातार हमलावर रहा. हाल में संघर्ष ज्यादा बढ़ा, जिसके पीछे हमास का इजरायल पर हमला था. गाजा युद्ध के बीच लेबनान के गुट हिजबुल्लाह ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश करते हुए इजरायल पर अटैक किए. इसके बाद से पूरे मिडिल ईस्ट में जंग के आसार हैं. यहां खास बात ये है कि हिजबुल्लाह के हेडक्वार्टर वाले देश लेबनान समेत लगभग पूरा मध्यपूर्व एक वक्त पर ईसाई बहुल रहा. 

पचास के दशक में लेबनान में 70 फीसदी क्रिश्चियन थे, जबकि बाकी 30 प्रतिशत में मुस्लिम और अन्य धर्मों को मानने वाले थे. साल 1932 में यहां आखिरी जनगणना हुई. इसके बाद से देश में सेंसस ही नहीं हो रहा. हालांकि यूएस स्टेट डिपार्टमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब यहां पर लगभग 70 फीसदी मुस्लिम हैं. इसमें शिया, सुन्नी और इस्लाइली सब शामिल हैं. बाकी जनसंख्या ईसाई और मिलीजुली है. 

साल 1970 तक भी पूरे मिडिल ईस्ट में लेबनान अकेला देश था, जो नॉन-मुस्लिम था, वहीं इजरायल यहूदी-बहुल था. इसकी राजधानी बेरूत को पूर्व का पेरिस कहा जाता. चूंकि यहां से अफ्रीका, एशिया और यूरोप व्यापार के लिए जुड़ते थे, तो आर्थिक नजरिए से भी ये काफी अहम हुआ करता. यहां किस्म-किस्म के व्यापारी आते और बेहिचक अपने धर्म का पालन किया करते थे. 

मुख्य पदों पर लगभग 60 फीसदी लोग ईसाई धर्म के हुआ करते. इसे लेकर मुस्लिम आबादी में असंतोष बढ़ने लगा. वे बराबर की हिस्सेदारी चाहते थे. इस बीच कई बातें हुईं. जैसे मुस्लिम बहुल आबादी के बीच रहने वाले ईसाइयों ने धर्म परिवर्तन कर लिया. यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड की ऑनलाइन रिपोर्ट में जिक्र है कि कन्वर्जन के बाद दूसरे धर्म में वापस लौटना आसान नहीं था. ऐसी कोशिश करने वाले कई समूहों को ब्लास्फेमी के आरोप में कड़ी सजाएं मिलीं. इस बीच दोनों के बीच मनमुटाव काफी हद तक बढ़ चुका था. 

20वीं सदी की शुरुआत में यहां धार्मिक समीकरण बदलने लगे. इसके पीछे कई घटनाओं का रोल रहा. सबसे पहले तो बात करें लेबनान सिविल वॉर की. मिडिल ईस्ट के सबसे खूनी संघर्षों में से एक इस युद्ध में ईसाई और मुस्लिम आमने-सामने थे. सत्तर के दशक से नब्बे तक चली जंग में धर्मों से जुड़े राजनैतिक समूह भी कूद पड़े थे.

इसी दौरान लेबनान की क्रिश्चियन आबादी को पहली बार अपनी कमजोरी का अहसास हुआ. हुआ ऐसा कि देश में भारी संख्या में फिलिस्तीनी भी शरण लिए हुए थे. वे भी लड़ाई में ईसाइयों के खिलाफ खड़े थे. वैसे जंग की एक वजह इन शरणार्थियों को भी माना जाता रहा. आजाद फिलिस्तीन के एजेंडा के साथ ये इजरायल को उकसाते रहे. बदले में इजरायली सेना भी कई बार लेबनान पर हमले करती रही. इसमें गेहूं में घुन की तरह लेबनानी ईसाई भी पिस रहे थे. इस बात ने भी समुदायों के बीच दूरी बढ़ा दी. 

वैसे तो ये घरेलू युद्ध था, लेकिन इसमें पड़ोसी देश भी कूद पड़े. जैसे सीरिया और इराक मुस्लिम गुटों के साथ थे, वहीं इजरायल क्रिश्चियन समूहों के सपोर्ट में था. इसी बीच कई चरमपंथी गुट बने, जैसे हिजबुल्लाह, अल-अमल और मुस्लिम सोशलिस्ट पार्टी. लगभग डेढ़ दशक चला युद्ध ताएफ एग्रीमेंट के साथ रुका.

नब्बे की शुरुआत में हुआ यह समझौता देश के कई धार्मिक और राजनीतिक समूहों के बीच हुआ था. इसके तहत देश की सत्ता में दोनों को समान हिस्सेदारी मिली. राष्ट्रपति पद ईसाइयों के लिए रिजर्व्ड हो गया, जबकि प्रधानमंत्री पद हमेशा सुन्नी मुस्लिम के लिए आरक्षित कर दिया गया. यहां तक कि पार्लियामेंट में सीटों का बंटवारा भी धार्मिक आधार पर हुआ. 

इसके बाद लेबनान का मजहबी स्ट्रक्चर एकदम से बदला. या यूं कहें कि बदलाव साफ दिखने लगा. गृहयुद्ध के बीच बहुत से ईसाई लेबनान छोड़कर पश्चिमी देशों में चले गए. ये पलायन बाद के सालों में भी चलता रहा. जंग खत्म होने के बाद फिलिस्तीन के अलावा सीरिया और जॉर्डन से भी मुस्लिम रिफ्यूजी लेबनान आकर बसने लगे. यहां की पॉलिटिकल व्यवस्था इसमें उनकी मदद करती रही. इस तरह से देश का धार्मिक रुझान तेजी से बदला. अब ज्यादा आबादी के चलते वहां राजनैतिक ताकत भी मुस्लिम नेताओं के हाथ में है. 

ये तो हुई लेबनान की बात, लेकिन पूरे मिडिल ईस्ट में ही पहले ईसाई आबादी काफी हुआ करती थी. येरूशलम एंड मिडिल ईस्ट चर्च एसोसिएशन के अनुसार चौथी सदी से पहले ही ये धर्म येरूशलम से होता हुआ सीरिया, जॉर्डन इजिप्ट और बाकी हिस्सों में पहुंचा. आगे चलकर बड़े धार्मिक अधिकारियों के बीच ही विवाद होने लगे. चर्चों के बीच बंटवारे होने लगे. इसके साथ ही धार्मिक स्ट्रक्चर भी बदलने लगा. सातवीं सदी में मिडिल ईस्ट में मुस्लिम व्यापारियों के आने के साथ डिवाइड बढ़ गया और बढ़ता ही चला गया.

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