MPox वायरस के खौफ के बीच जान लीजिए 10 nonillion वायरस इस समय एक्टिव हैं धरती पर!

MPox वायरस 116 देशों में फैल चुका है. ये संक्रमण साल 2022 से हो रहा है. धीरे-धीरे. लेकिन मुद्दा ये नहीं है कि सिर्फ यही एक वायरस चिंता का विषय है. इससे पहले कोरोनावायरस ने पूरी दुनिया से काफी ज्यादा लोगों को मार डाला. धरती पर कितने वायरस हैं, जो इतना परेशान कर सकते हैं. पूरी की पूरी आबादी खत्म कर सकते हैं. क्या एक दिन धरती पर सिर्फ वायरस ही राज करेंगे. 

नेशनल जियोग्राफिक के अनुसार धरती पर इस समय 1,000,000,000,000,000,000,000,000,000,000 वायरस एक्टिव हैं. आसान कर देते हैं इसे- 1 के पीछे 30 जीरो. इनमें हर एक वायरस अलग-अलग है. सबकी अपनी आइडेंटिटी है. दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां वायरस न हो. आपके शरीर में 380 ट्रिलियन यानी 38 लाख करोड़. तो सोचिए दुनियाभर में बाकी जीवों, जंतुओं, जगहों पर कितने वायरस होंगे. 

यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर की वायरोलॉजिस्ट सारा सॉयर कहती हैं कि वायरस हमारी दुनिया में नहीं रह हे हैं. हम उनकी दुनिया में रह रहे हैं. उन्होंने हमें जीवनदान दिया हुआ है. हमारी कुल आबादी उनकी संख्या की तुलना में कुछ भी नहीं है. किस्मत अच्छी है कि सभी वायरस हमें नुकसान नहीं पहुंचाते. क्योंकि वायरस बेहद चुनिंदा कोशिकाओं पर ही हमला करते हैं. आइए जानते हैं कि वायरस कैसे रिप्रोड्यूस करता है? 

बाकी जीव अपने वंश को बढ़ाने के लिए किसी की हत्या नहीं करते. किसी को मारते नहीं. किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते. लेकिन वायरस ये करता है. वायरस का रिप्रोडक्शन यानी ज्यादा संक्रमण. वायरस का रिप्रोडक्शन बढ़ना यानी उसकी आबादी में इजाफा. जितना ज्यादा रिप्रोडक्शन होगा… उतना ज्यादा संक्रमण फैलेगा.  

दुनिया में मौजूद सारे वायरस एक ही तरीके से रिप्रोडक्शन करते हैं. जैसे हम इंसान या कोई अन्य जीव करते हैं. लेकिन वायरसों के रिप्रोडक्शन का तरीका अलग है. किसी भी वायरस को रिप्रोडक्शन करने के लिए किसी साथी की जरुरत नहीं होती. यानी वायरस में न नर होते हैं. न मादा. ये अपना क्लोन बनाते हैं. अपने ही शरीर से जेनेटिक मैटेरियल निकाल कर कई वायरस पैदा कर देते हैं. 

इनके रिप्रोडक्शन की प्रक्रिया किसी परमाणु विस्फोट के चेन रिएक्शन की तरह होती है. एक से तीन, तीन से 9 और उसके आगे… बढ़ते रहते हैं. कोई भी वायरस सबसे पहले आपके शरीर में प्रवेश करता है. फिर वह टारगेट सेल (Cell) से चिपकता है. Cell के अंदर खुद जाता है या अपना जेनेटिक मैटेरियल छोड़ता है. जेनेटिक मैटेरियल उसी कोशिका के न्यूक्लियस में जाता है. न्यूक्लियस को खाकर उसमें मौजूद जेनेटिक मैटेरियल खुद को रेप्लीकेट करता है. यानी नए जेनेटिक मैटेरियल बनाता है. 

जितना ज्यादा जेनेटिक मैटेरियल उतने ज्यादा नए वायरस. कोशिका के अंदर मौजूद छोटे अंग इस रेप्लीकेशन में मदद करते हैं. यानी वायरस उस कोशिका को खत्म कर चुका होता है. अपने रिप्रोडक्शन के लिए कोशिका को मार चुका होता है. अब एक वायरस के कई रूप तैयार हो चुके होते हैं. यानी एक वायरस के अब कई संस (Sons) बन चुके होते हैं. ये बाहर निकलते हैं, दूसरी कोशिकाओं के साथ ही ऐसा ही करते हैं. यही प्रक्रिया पूरे शरीर में चलती रहती है. आप बीमार और बहुत बीमार होते चले जाते हैं.  

एक ही वायरस जब तक एक जैसे संस पैदा करता रहता है, तब तक उसे एक वैरिएंट बोलते हैं. लेकिन जैसे ही वो अपने स्वरूप में बदलाव करता है, उसका वैरिएंट बदल जाता है. यहीं से खेल शुरू होता है वैरिएंट्स के बनने का. वैरिएंट्स कई तरह से बन सकते हैं. इसीलिए तो अलग-अलग वैरिएंट्स के अलग-अलग नाम दिए जाते हैं. क्योंकि हर एक वैरिएंट का रिप्रोडक्शन का तरीका तो एक जैसा है, लेकिन इस प्रक्रिया में वो शरीर के अंदर कत्ल-ए-आम मचाते हैं.   

160 साल पहले चार्ल्स डार्विन ने वायरस के वैरिएंट्स को लेकर समझाया था. उन्होंने इसे कन्वर्जेंस-Convergence कहा था. यानी एक वैरिएंट दूसरे के साथ म्यूटेट करके नया सब-वैरिएंट बना रहा था. इस समय सब-वैरिएंट्स के बीच संक्रमण फैलाने और म्यूटेशन की प्रतियोगिता चल रही है. 

अगले 50 साल के अंदर स्तनधारियों से दूसरे स्तनधारियों के बीच वायरस की अदला-बदली के 15 हजार मामले सामने आ सकते हैं. वजह है जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक गर्मी (Global Warming). वैश्विक गर्मी से वाइल्डलाइफ हैबिटेट में बदलाव आएगा. जानवरों का आपस में एनकाउंटर बढ़ेगा. एकदूसरे के वायरस इधर से उधर होंगे. जिसका नुकसान इंसानों को भी बर्दाश्त करना होगा.  

दुनियाभर के कई रिसर्चर्स का ये मानना है कि कोविड-19 महामारी ने शायद वायरस की स्वैपिंग यानी अदला-बदली का काम शुरु कर दिया है. क्योंकि यह एक जानवर से इंसान में पाया. जिसे जूनोटिक ट्रांसमिशन (Zoonotic Transmission) कहते हैं. अगर इसी तरह से वायरस एक जीव या प्रजाति से दूसरी जीव या प्रजाति में जाता रहा तो वायरसों से होने वाली महामारियों की सीरीज लगी रही हैं. यह इंसानों और जानवरों के लिए खतरा है.  

सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को किस तरह के काम करने होंगे ताकि पैथोजेन के हमले से बचा जा सके. हेल्थ-केयर इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे सुधारा जाए. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की साइंटिस्ट केट जोन्स जिन्होंने इकोसिस्टम और ह्यूमन हेल्थ के बीच के संबंधों पर स्टडी की है, उन्होंने बताया कि हमनें अभी पहला कदम रखा है यह जानने के लिए कि क्या क्लाइमेट और लैंड-यूज बदलने से अगली महामारी जल्दी आ सकती है.  

शोधकर्ताओं को आशंका है कि नए वायरसों की अदला-बदली ज्यादा तब होगी जब दुनियाभर में स्थानीय स्तर पर एक जानवर दूसरे किसी अन्य जानवर से पहली बार मिलेगा. क्योंकि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है, लगातार बढ़ता तापमान. सबसे ज्यादा समस्या जीवों की विभिन्नता वाले देशों में, जैसे- अफ्रीका और एशिया. अफ्रीका के साहेल इलाके, भारत और इंडोनेशिया में वायरसों की अदला-बदली ज्यादा होगी. क्योंकि यहां पर संक्रमण फैलने की वजह आबादी का घनत्व भी है. 

इस सदी के अंत तक धरती का औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की आशंका थी लेकिन नई स्टडीज के मुताबिक यह 2070 तक दोगुनी हो जाएगी. इसकी वजह से भारत, इंडोनेशिया, एशियाई और अफ्रीकी देशों में वायरस की अदला-बदली होने की आशंका बढ़ जाएगी. ये स्थान इस मामले में हॉटस्पॉट बन जाएंगे.  

वैज्ञानिकों ने इस स्टडी के लिए खास तरह का मॉडल बनाया. जिसमें पता किया गया कि जब धरती चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा तापमान के साथ गर्म होगी, तो कौन-कौन से स्तनधारी जीव कहां-कहां से भागेंगे. कहां-कहां इनका दूसरे जीवों से सामना होगा. इससे यह पता चला कि इन जीवों में मौजूद वायरस दूसरे स्तनधारियों तक जाएंगे. फिर ये इंसानों में भी फैलेंगे. 

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