छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट
करीब 20 साल पुराने दुष्कर्म मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए सजा में कमी कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि दुष्कर्म (रेप) के अपराध को सिद्ध करने के लिए ‘प्रवेश’ यानी पेनेट्रेशन का प्रमाण आवश्यक है। केवल स्खलन या निजी अंगों को रगड़ना रेप नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे रेप का प्रयास समझा जाएगा।
यह फैसला धमतरी के वर्ष 2004 के मामले में आरोपी की अपील पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
क्या था पूरा मामला?
- घटना: 21 मई 2004
- स्थान: धमतरी जिला
- आरोप: महिला को बहाने से घर ले जाकर जबरन यौन कृत्य
- अतिरिक्त आरोप: हाथ-पैर बांधना, मुंह में कपड़ा ठूंसना, कमरे में बंद करना
6 अप्रैल 2005 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, धमतरी ने आरोपी को:
- IPC धारा 376(1) के तहत 7 वर्ष कठोर कारावास
- IPC धारा 342 के तहत 6 माह की सजा
सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने की। 16 फरवरी को जारी आदेश में अदालत ने कहा:
- पीड़िता के बयानों में प्रवेश (पेनेट्रेशन) को लेकर विरोधाभास है
- मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं
- डॉक्टर ने केवल आंशिक प्रवेश की संभावना जताई
- फॉरेंसिक जांच में मानव शुक्राणु मिले, लेकिन इससे रेप स्वतः सिद्ध नहीं होता
अदालत ने माना कि महिला के साथ यौन और हिंसक हमला हुआ, लेकिन दुष्कर्म की सजा बनाए रखने के लिए आवश्यक ‘प्रवेश’ का ठोस प्रमाण नहीं मिला।
सजा में क्या बदलाव हुआ?
हाई कोर्ट ने:
- IPC धारा 376(1) के तहत दोषसिद्धि निरस्त की
- इसे धारा 376 सहपठित धारा 511 (दुष्कर्म का प्रयास) में परिवर्तित किया
नई सजा:
- 3 वर्ष 6 माह कठोर कारावास
- 200 रुपये जुर्माना
- धारा 342 के तहत 6 माह की जेल
- सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ट्रायल के दौरान लगभग 1 वर्ष 1 माह जेल में रह चुका है, जिसका लाभ उसे CrPC की धारा 428 के तहत मिलेगा।
आत्मसमर्पण का निर्देश
चूंकि आरोपी फिलहाल जमानत पर है, अदालत ने उसे दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। उम्र के आधार पर सजा में राहत देने की मांग अदालत ने खारिज कर दी।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह निर्णय कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि:
- अदालत ने रेप और रेप के प्रयास के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया
- पेनेट्रेशन को अपराध सिद्धि का आवश्यक तत्व बताया
- केवल स्खलन को पर्याप्त साक्ष्य मानने से इंकार किया
यह फैसला भविष्य के मामलों में कानूनी बहस को नई दिशा दे सकता है।
इस मामले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आपराधिक मामलों में साक्ष्य और कानूनी परिभाषा कितनी अहम भूमिका निभाते हैं। अदालत का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में तथ्यों और प्रमाणों के महत्व को रेखांकित करता है।