पूर्व उपाधीक्षक अख्तर अली की याचिका के बाद अस्पताल में वित्तीय अनियमितताओं और अनैतिक प्रथाओं के आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश दिया है.

अली ने आरोप लगाया है कि साल 2000 से 2023 तक और मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष के कार्यकाल में, अस्पताल में लगातार वित्तीय अनियमितताएं और अवैध गतिविधियां देखी गईं. 

अली अख्तर ने दावा किया कि उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और दस्तावेजी सबूत भी पेश किए हैं, जिसमें आर्थिक लाभ के लिए विभिन्न अवैधताओं की जानकारी दी गई है. अली के वकील ने बताया कि इन प्रयासों के बावजूद राज्य सरकार लंबे समय तक आरोपों पर चुप रही. याचिकाकर्ता ने आगे तर्क दिया कि इन अनियमितताओं की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन में देरी ने उनके दावों को साबित करने का काम किया. 

अली ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि लगातार शिकायतें दर्ज करने और पुलिस सुरक्षा मांगने के बाद भी अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई. राज्य ने पुलिस की निष्क्रियता के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि शिकायत पश्चिम बंगाल सरकार के परिवार और स्वास्थ्य विभाग को भेज दी गई थी. हालांकि, अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि प्रतिक्रिया में कोई ठोस कदम उठाया गया या नहीं.

राज्य सरकार कहा कि एसआईटी का गठन एक स्वायत्त निर्णय था, जिसका अली की शिकायत से कोई संबंध नहीं था. इसमें वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई सभी शिकायतों की जांच करने का काम सौंपा गया था. सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार की ओर से पेश एएसजी ने मामले को सीबीआई को सौंपे जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई. 

उन्होंने कहा, ‘अगर जांच सीबीआई को सौंपी जाती है तो हमें कोई आपत्ति नहीं है.’ अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि उसकी भूमिका यह निर्धारित करने तक ही सीमित है कि पुलिस ने अपने कानूनी कर्तव्यों को पूरा किया है या नहीं. 

कोर्ट ने यह भी कहा, ‘उच्च न्यायालय एक तथ्य खोजने वाली संस्था या ट्रायल कोर्ट के रूप में काम नहीं कर सकता है. यह प्रशासनिक विफलताओं को संबोधित करता है.’ हालांकि यह स्वीकार किया गया कि जांच एसआईटी के अंडर जारी रहनी चाहिए या सीबीआई को सौंप दी जानी चाहिए, यह एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है. 

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरजी कर अस्पताल से संबंधित कई आरोपों और इस तथ्य को देखते हुए कि सीबीआई पहले से ही संस्थान से जुड़े एक अलग बलात्कार और हत्या के मामले की जांच कर रही है, वित्तीय अनियमितताओं की जांच भी सीबीआई द्वारा की जानी चाहिए.

अदालत ने कहा, ‘जांच को अलग-अलग एजेंसियों में बांटा नहीं जा सकता है. सीबीआई द्वारा जांच से निरंतरता सुनिश्चित होगी.’ व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए उनके अनुरोध के संबंध में अदालत ने कोई तत्काल जरूरत महसूस नहीं की, लेकिन कहा कि अगर आवश्यक हो तो अली अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं. सीबीआई को तीन हफ्तों के भीतर प्रोगेस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है.

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