चुनावी रणनीति में बदलाव: केजरीवाल का चुनाव छोड़ने का फैसला, फायदे और नुकसान क्या हो सकते हैं?

दिल्ली में विधानसभा चुनाव की हार के बाद आम आदमी पार्टी (आप) ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए MCD (दिल्ली नगर निगम) में मेयर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया है। अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली पार्टी के इस कदम से दिल्ली में ‘भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार’ का रास्ता साफ हो गया है। भाजपा के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख रखने वाली ‘आप’ ने आखिर क्यों बिना लड़े ही उसके सामने हथियार डाल दिया, राजनीतिक विश्लेषक इसका जवाब तलाशने में जुटे हैं। फिलहाल इतना कहा जा रहा है कि आप ने दो डर और एक फायदे की उम्मीद में एमसीडी की सत्ता आसानी से अपने हाथ से जाने देने का फैसला किया है। हालांकि, 2 साल बाद एमसीडी चुनाव में ‘आप’ के लिए यह दांव उलटा भी पड़ सकता है।

किन दो बातों का था डर

‘आप’ ने भले ही यह कहकर हाई मोरल ग्राउंड लेने की कोशिश की कि चुनाव जीतने के लिए उन्हें जोड़तोड़ करना पड़ता, जो वह करना नहीं चाहती, पर सच्चाई यह है कि पार्टी जानती है कि 2022 में मिली बहुमत अब उसके हाथ से फिसल चुकी है। पार्टी अपने पार्षदों को एकजुट रखने में नाकामयाब रही। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पार्टी कुछ महीने पहले ही विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद लगातार दूसरी पराजय का सामना करने से डर गई। संभवत: पार्टी को इस बात की आशंका रही होगी कि लगातार दूसरी हार की खबरों से उसके कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर होगा और इसका प्रभाव पंजाब तक हो सकता है, जहां पार्टी अभी से विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई है।

क्या बड़ी टूट की थी आशंका

2022 के अंत में हुए हुए एमसीडी चुनाव में ‘आप’ ने भाजपा से 15 साल पुरानी सत्ता छीनते हुए 134 पार्षद जीते थे, जबकि भाजपा को 104 वार्ड में जीत मिली थी। करीब ढाई साल तक चले दलबदल के खेल के बाद अब भाजपा के पास 117 पार्षद हैं। जबकि आम आदमी पार्टी के पास 113 पार्षद हैं। बताया जा रहा है कि 25 तारीख को होने जा रहे मेयर चुनाव में ‘आप’ को ना सिर्फ हार साफ दिख रही थी बल्कि उसे कुछ और पार्षदों के क्रॉस वोटिंग का डर था। ऐसा होने पर पार्टी की एकजुटता पर भी नए सवाल खड़े हो जाते।

किस फायदे की उम्मीद

दरअसल, ‘आप’ ने काफी सोच-विचार के बाद मेयर चुनाव नहीं लड़ने और एमसीडी में विपक्ष में बैठने का फैसला किया है। पार्टी को उम्मीद है कि निगम की सत्ता में जाने के बाद वह भाजपा की रेखा गुप्ता सरकार पर ‘फ्री स्टाइल’ हमला कर पाएगी। गली-नाली, साफ-सफाई से लेकर दिल्ली के हर मुद्दे पर वह भाजपा सरकार की घेराबंदी करके उसकी छवि को शुरुआत से ही डेंट कर पाएगी जिसका फायदा वह आगामी चुनावों में उठा पाएगी। ‘आप’ को लगता है कि जिस तरह एमसीडी चुनाव में हार के बाद भाजपा को विधानसभा चुनाव में जीत मिली उसी तरह अब उसे भी निगम से हटने का फायदा मिल सकता है। असल में दिल्ली की आबादी और सघन बसावट की वजह से निगम के कामकाज से जनता को संतुष्ट कर पाना किसी के लिए आसान नहीं है।

क्या उलटा भी पड़ सकता है दांव

‘आप’ ने भले ही कुछ आशंकाओं और संभावित फायदों के उम्मीद में मेयर चुनाव से दूरी बना ली है, लेकिन कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी का यह दांव उलटा भी पड़ सकता है। सौरभ भारद्वाज ने जिस तरह ‘भाजपा को चला लेने दो, दिल्ली में ट्रिपल इंजन सरकार का काम दिखा लेने दो’ कहकर भाजपा के रास्ते से हट जाने का ऐलान किया, उससे सवाल उठ रहा है कि क्या 2027 के एमसीडी चुनाव में ‘आप’ ने भाजपा को अभी से यह कहने का मौका दे दिया है कि निगम में भी उसकी सरकार होने से दिल्ली का अधिक विकास होगा। जिस तरह ‘आप’ ने यह कह दिया है कि तीनों सरकारें भाजपा की होने से बहानेबाजी का मौका नहीं मिलेगा, भाजपा के ‘ट्रिपल इंजन’ वाले नारे को इससे मजबूती मिलेगी। दूसरी तरफ यदि इस मौके को भाजपा ने भुना लिया और बचे हुए कार्यकाल में दिल्ली की स्थिति में सुधार लाने में कामयाब रही तो ‘आप’ के लिए वापसी कुछ और मुश्किल हो सकती है।

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