पालतू कुत्तों पर क्रूरता
रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दो पालतू कुत्तों के साथ की गई क्रूरता ने एक बार फिर पशु संरक्षण के मुद्दे को गरमा दिया है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह मामले ने सबका ध्यान आकर्षित किया। आरोप है कि इन पालतू कुत्तों में से एक को उबलते पानी से झुलसाया गया, जबकि दोनों कुत्तों के साथ शारीरिक क्रूरता की गई। यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह समाज की संवेदनशीलता और मानवता पर भी सवाल उठाता है।
कैसे सामने आई घटना?
इस घटना का खुलासा तब हुआ जब एक चिंतित पड़ोसी ने क्रूरता का वीडियो रिकॉर्ड किया और सोशल मीडिया पर साझा किया। वीडियो में दिखाए गए दृश्य बेहद दर्दनाक थे, जिसमें एक कुत्ते को उबलते पानी से झुलसाते हुए दिखाया गया, जबकि दोनों कुत्तों के साथ लगातार मारपीट की जा रही थी। स्वयंसेवकों वंचना लाबन, दीपेश मौर्य और उर्जा शृंगारपुरे ने तत्काल मौके पर पहुंचकर कुत्तों की स्थिति देखी और अधिकारियों से संपर्क किया।
PETA इंडिया की प्रतिक्रिया
घटना की जानकारी मिलते ही PETA इंडिया ने डीसीपी नॉर्थ और एसीपी से संपर्क किया और खमरडीह पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करने का आग्रह किया। पीटाआइ इंडिया ने पुलिस अधिकारियों से कुत्तों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने और उन्हें उचित चिकित्सकीय उपचार मुहैया कराने की अपील की, ताकि आगे किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या से कुत्तों को बचाया जा सके।
कानूनी कार्रवाई
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 325 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है, जो किसी भी पशु को अपंग करने या मारने के मामले में संज्ञेय अपराध मानती है। इस धारा के तहत आरोपी को पाँच साल तक का कारावास, जुर्माना, या दोनों सजा हो सकती है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और संदिग्धों से पूछताछ की प्रक्रिया भी चल रही है।
समाज की जिम्मेदारी
यह घटना केवल कानूनी मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की जिम्मेदारी को भी दर्शाती है। जब हम पशुओं के साथ क्रूरता का सामना करते हैं, तो यह केवल उनकी करुणा का उल्लंघन नहीं होता, बल्कि यह समाज के मानवीय मूल्यों पर भी चोट करता है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि पालतू पशु न केवल हमारी संपत्ति हैं, बल्कि वे भी जीवित प्राणी हैं जिनके पास दर्द और भावनाएं हैं।
आखिरकार, क्या हम संवेदनशील होंगे?
यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि संवेदनहीनता को अगर नजरअंदाज किया जाता है तो यह एक दिन सामान्य बन सकती है। यदि हम बेजुबान जानवरों के दर्द को अनदेखा करते हैं, तो यह हमारे समाज की कठोरता को दर्शाएगा। कानून अपनी जगह है, लेकिन सभ्यता का असली मापदंड हमारी दया और करुणा है।
न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, और यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में न्याय किस प्रकार मिलता है। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम उन मौन कराहों को महसूस करेंगे, जो अपनी व्यथा शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकतीं?
जांच जारी है, और अब यह समाज पर निर्भर है कि वह अपनी जिम्मेदारी को कैसे निभाता है।