नक़ली दवाएं
प्रदेश में दवाओं की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल
छत्तीसगढ़ में नक़ली दवाओं और घटिया गुणवत्ता वाली जीवनरक्षक दवाओं का कारोबार अब एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिस ड्रग कंट्रोलर विभाग की जिम्मेदारी दवाओं की गुणवत्ता, मानक और सुरक्षा सुनिश्चित करना है, वही विभाग अपनी मूल जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बैठा है। हालात ऐसे हैं कि प्रदेश में मरीजों की जान अब मानो “भगवान भरोसे” छोड़ दी गई है।
भारत सरकार के ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के अनुसार किसी भी दवा की लॉन्चिंग और बाजार में बिक्री के दौरान उसकी नियमित गुणवत्ता जांच अनिवार्य है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ड्रग विभाग न तो समय पर सैंपल जांच कर रहा है और न ही बाजार में मौजूद दवाओं की प्रभावशीलता पर निगरानी रखी जा रही है।
पत्रकारों से ‘मुखबिरी’ की मांग, खुद कार्रवाई से परहेज
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब नक़ली या घटिया दवाओं का मुद्दा सामने आता है तो विभाग का जवाब होता है—
“सबूत लाओ, मुखबिरी करो।”
जबकि कानूनन यह विभाग की जिम्मेदारी है कि:
- नियमित रूप से दवा दुकानों और डिस्ट्रीब्यूटर गोदामों का निरीक्षण करे
- दवाओं के सैंपल लेकर लैब जांच कराए
- नई दवाओं को बिक्री की अनुमति देने से पहले गुणवत्ता सुनिश्चित करे
लेकिन विभागीय उदासीनता से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि ड्रग कंट्रोल विभाग नक़ली दवा माफियाओं के दबाव या मिलीभगत में काम कर रहा है।
जांच में सामने आई भयावह सच्चाई
स्वतंत्र जांच और पड़ताल में यह सामने आया कि:
- बड़ी-बड़ी नामी कंपनियों की टैबलेट्स में
- लिखी गई मात्रा (जैसे 600 mg, 50 mg)
- वास्तविक गुणवत्ता से 50% से भी कम पाई गई
इसका सीधा मतलब यह है कि बाजार में बिक रही दवाएं न तो मानक के अनुरूप हैं और न ही मरीज के इलाज में प्रभावी।
परिणाम:
- बीमारी ठीक नहीं होती
- डॉक्टर दवाएं बदल-बदलकर प्रयोग करते रहते हैं
- मरीज नई-नई साइड इफेक्ट बीमारियों और कैंसर जैसे जोखिमों की ओर बढ़ता है
मोटी तनख्वाह, शून्य जिम्मेदारी?
ड्रग विभाग के कई अधिकारी:
- मोटी तनख्वाह लेकर
- कार्यालयों में बैठे रहते हैं
- और कथित रूप से दवा माफियाओं से मासिक वसूली कर
- जनता को ज़हरनुमा दवाएं परोसने में आंख मूंदे रहते हैं
नियमों के अनुसार ड्रग इंस्पेक्टरों को:
- हर सप्ताह डिस्ट्रीब्यूटर गोदामों की जांच
- रोज़ाना दवा दुकानों का निरीक्षण
- बिलिंग, स्टॉक और गुणवत्ता की जांच
करनी चाहिए, लेकिन ये सब कागज़ों तक सीमित रह गया है।
नक़ली दवाओं का पूरा खेल कैसे चलता है?
नक़ली दवाओं का कारोबार इस तरह चलता है:
- दवा के रैपर पर केमिकल और उसकी मात्रा लिख दी जाती है
- वास्तविक दवा में वह मात्रा डाली ही नहीं जाती
- ड्रग विभाग बिना जांच के बिक्री की अनुमति दे देता है
- बाजार में घटिया दवा “100% असली” बताकर बेची जाती है
यह सब भ्रष्टाचार, मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं।
जनता की सेहत से खिलवाड़, सरकार बदनाम
इस पूरे तंत्र का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि:
- जनता बीमार हो रही है
- सरकार की छवि खराब हो रही है
- जबकि असली दोषी भ्रष्ट अधिकारी और दवा माफिया हैं
यह जानना बेहद जरूरी है कि प्रदेश को बदनाम करने की साजिश के पीछे कौन लोग हैं और नक़ली दवा कारोबार को संरक्षण कौन दे रहा है।