कानूनी रूप ले सकती है हसीना को लौटाने की मांग, तब कौन से विकल्प होंगे भारत के पास,

पिछले महीने बांग्लादेश में बड़ी उथल-पुथल के बाद तत्कालीन पीएम शेख हसीना को इस्तीफा देकर भारत आना पड़ा. इस बीच प्रोटेस्टर पीएम हाउस पर हमला बोल चुके थे. माना जा रहा है कि नई सरकार भी हसीना के लिए शायद ही नरम रवैया रखे. ऐसे में उनकी घर वापसी सुरक्षित नहीं. हालांकि वहां से लगातार प्रत्यर्पण की मांग उठ रही थी, जो अब कानूनी रूप लेने जा रही है. 

वर्तमान अंतरिम सरकार पर कथित तौर पर जनता का भारी दबाव है कि वो हसीना को वापस लौटाकर उनपर ट्रायल चलाएं. पूर्व पीएम पर आरक्षण खत्म करने की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों की हत्या का आरोप है. साथ ही कई घोटालों को लेकर भी वे संदेह के घेरे में हैं. इधर तख्तापलट के बाद से हसीना भारत में सेफ हाउस में छिपी हुई हैं. लगभग डेढ़ महीने बाद बांग्लादेश की एक खास शाखा उनके प्रत्यर्पण को कानूनी रूप देने जा रही है. 

इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल बांग्लादेश की घरेलू कोर्ट है, जिसने इसपर काम शुरू कर दिया. इसके तहत 15 जुलाई से लेकर 5 अगस्त तक प्रदर्शनकारियों पर हुए हमलों को लेकर हसीना समेत नौ दूसरे लोगों पर जांच चल रही है. दिलचस्प बात यह है कि आईसीटी की नींव लगभग पंद्रह साल पहले हसीना सरकार के समय ही रखी गई थी. अब यही बॉडी उनपर ट्रायल की तैयारी कर चुकी. 

साल 2010 में बांग्लादेश सरकार ने एक स्पेशल कोर्ट तैयार की. इसका काम देश की आजादी के समय हुई हिंसा के जिम्मेदार लोगों को सजा देना था. वॉर क्राइम के अलावा बड़े पैमाने पर नरसंहार के आरोपियों का ट्रायल भी इसके जिम्मे था.

बांग्लादेश में बनी ये कोर्ट एकदम से इंटरनेशनल सुर्खियों में आ गई, जब इसने ब्रिटिश पत्रकार डेविड बर्गमैन पर अवमानना का केस किया. दरअसल बर्गमैन ने वॉर क्राइम को लेकर हो रही प्रोसिडिंग को लेते हुए अदालत पर ही कई लेख लिखे थे. इसमें उन्होंने कई डेटा देते हुए आरोप लगाया कि अदालत गलत आंकड़े दे रही है. इसपर कोर्ट ने उन्हें भारी जुर्माना भरने को कहा था. इसके पहले कोर्ट अपने ही देश के कई पत्रकारों को निशाने पर ले चुकी थी. 

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान हुए युद्ध अपराधों के अलावा स्पेशल कोर्ट नरसंहार को भी देखती है. हालांकि ये पहला मौका है, जब वो हसीना के मामले में ट्रायल की तैयारी कर रही है. पूर्व पीएम पर नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध के तहत शिकायतें दर्ज की गई हैं. बता दें कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों के दौरान चार सौ से ज्यादा लोगों के मारे जाने के दावे हो रहे हैं. अगस्त में ही यूएन की एक टीम भी मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए ढाका गई थी. अगर ये आरोप सही पाए जाते हैं, या इनकी परादर्शी जांच की बात चलती है तो हसीना के लौटने को लेकर दबाव बढ़ सकता है. तब नई दिल्ली के पास क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं?

भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 से प्रत्यर्पण संधि है. प्रत्यर्पण संधि के मुताबिक, दोनों देशों को एक-दूसरे के अपराधी सौंपने पड़ते हैं. प्रत्यर्पण संधि के कारण ही नवंबर 2015 में बांग्लादेश ने अनूप चेतिया को भारत को सौंपा था. अनूप चेतिया असम के अलगाववादी संगठन उल्फा का नेता था और 1997 से ढाका की जेल में बंद था. 

इस प्रत्यर्पण संधि में प्रावधान है कि अगर किसी व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जिसमें कम से कम एक साल की सजा का प्रावधान है, तो उसे प्रत्यर्पित किया जाएगा. संधि में लिखा हुआ है कि अगर किसी व्यक्ति ने राजनैतिक स्वरूप का कोई अपराध किया है तो उसके प्रत्यर्पण से इनकार भी किया जा सकता है. हालांकि हत्या, नरसंहार और अपहरण जैसे अपराधों में शामिल व्यक्ति को प्रत्यर्पित करने से इनकार नहीं किया जा सकता.

दोनों देशों के बीच संधि के अनुच्छेद 10(3) के तहत, इसकी रिक्वेस्ट करने वाले देश को शरण देने वाले देश के सामने अरेस्ट वारंट देना ही काफी है. इसके लिए आरोपों का साबित होना भी जरूरी नहीं. इसके पहले संधि में प्रत्यर्पण की रिक्वेस्ट करने वाले देश को गिरफ्तारी वारंट के अलावा अपराध के सबूत भी साझा करने होते थे. इस नियम को साल 2016 में खत्म कर दिया गया ताकि अपराधियों का प्रत्यर्पण आसान और जल्दी हो सके. 

हालांकि कोई देश प्रत्यर्पण से इनकार भी कर सकता है अगर अपराध राजनैतिक हो, या फिर आरोपी ये यकीन दिला सके कि राजनैतिक द्वेष की वजह से ऐसा किया जा रहा है, या फलां देश लौटने पर उसकी जान को खतरा हो सकता है. 

भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि का संधि का अनुच्छेद 21(3) दोनों ही देशों को ये इजाजत देता है कि वे संधि खत्म कर सकें. ऐसा कोई एक पक्ष भी कर सकता है. हालांकि ये बेहद बड़ा कदम है, जो नई दिल्ली और ढाका के रिश्तों पर सीधा असर डाल सकता है. यहां तक कि बात डिप्लोमेटिक रिश्ते चरमराने तक जा सकती है. कुल मिलाकर, ये एक एक्सट्रीम कदम है, जो नाजुक हालातों में ही लिया जा सकता

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