देश के इस राज्य में अलग झण्डे की मांग, हाईकोर्ट ने कहा- टाइम क्यों बर्बाद करते हो

कर्नाटक हाईकोर्ट ने शुक्रवार को राज्य के लिए अलग झण्डे की मांग करने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। कर्नाटक में लंबे समय से यह मांग उठ रही है जिसे लेकर कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। चीफ जस्टिस एनवी अंजारिया और जस्टिस केवी अरविंद की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा, “इस तरह की शिकायत के मामले शायद ही कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हों। यह जनहित का मामला तो बिल्कुल भी नहीं है। याचिका का कोई आधार नहीं है और यह समय की बर्बादी है इसीलिए इसे खारिज किया जा रहा है।” याचिका में तर्क दिया गया था कि भारत का संविधान राज्यों को अपना अलग झण्डा रखने से नहीं रोकता है।

याचिका की तरफ से पेश वकील ने कहा, “पूरे कर्नाटक में राज्य ध्वज की मांग की जा रही है और राज्य में एक अनौपचारिक झण्डा फहराया भी जा रहा है। जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। किसी भी अधिनियम में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।” उन्होंने कहा कि यह मुद्दा कर्नाटक के लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है और इसीलिए याचिका में राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह समिति की सिफारिश को विचार के लिए कोर्ट के सामने रखे और कानून के अनुसार उस पर उचित आदेश पारित करे।

इतिहास की बात करे तो राज्य में 1960 के दशक से एक अनौपचारिक कन्नड़ झंडा है। दो रंगों वाला लाल और पीला झंडा स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय है और कई कन्नड़ कार्यकर्ता इसे दुपट्टे या शॉल के रूप में भी पहनते हैं। हालांकि फिलहाल भारत में किसी भी राज्य का कोई अलग आधिकारिक राज्य ध्वज नहीं है।

2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य ध्वज को औपचारिक रूप से अपनाने पर जानकारी देने के लिए एक नौ सदस्यीय पैनल का गठन किया था। कन्नड़ और संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव जीएस सिद्धारमैया की अध्यक्षता वाले इस पैनल में कई विद्वान, इतिहासकार और लेखक शामिल थे। राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद डिजाइनरों की एक टीम ने राज्य ध्वज का एक अलग संस्करण तैयार किया था जो राष्ट्रीय तिरंगे के जैसा ही था लेकिन उसके बीच में चक्र की जगह कर्नाटक का राजकीय प्रतीक था। सिद्धारमैया ने 8 मार्च 2018 को इस डिजाइन का अनावरण किया था। इसके बाद कर्नाटक के नए झण्डे को कानूनी दर्जा देने की मांग करते हुए केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भेजा गया था। इसकी भाजपा और कई पार्टियों ने आलोचना की थी। कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी और बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में सरकारें बनी लेकिन उन्होंने केंद्र सरकार के सामने यह प्रस्ताव पेश नहीं किया। बाद में येदियुरप्पा सरकार ने अगस्त 2019 में राज्य की ओर से औपचारिक रूप से इस प्रस्ताव को वापस ले लिया।

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