जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. इस बीच, आजतक ने सी-वोटर के साथ मिलकर देश का मिजाज (Mood of the Nation Survey) जाना है. इस सर्वे में 1 लाख 36 हजार 463 का सैंपल साइज लिया गया है. ये सर्वे 15 जुलाई से 10 अगस्त के बीच किया गया है. जम्मू और कश्मीर में जनता की राय क्या है? सर्वे में 5 बड़े फैक्टर भी निकलकर आए हैं. जम्मू कश्मीर में लोग अब आतंक की बात नहीं करते हैं, बल्कि विकास चाहते हैं और मुख्यधारा से जुड़ने के लिए खासे उत्साहित हैं. यहां पिछले 5 साल में हालात पूरी तरह से बदल गए हैं. अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर की सियासी फिजा भी बदल रही है.
इस केंद्र शासित प्रदेश में सबसे बड़े मुद्दों में बेरोजगारी हावी है. यहां 47 फीसदी लोगों ने बेरोजगारी को बड़ी समस्या बताया है. उसके बाद 17 फीसदी लोगों ने महंगाई से परेशान होना बताया है. 11 फीसदी विकास कार्य चाहते हैं. 4 फीसदी ने माना कि राज्य की सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार है. कानून व्यवस्था और किसानों के मुद्दे को एक-एक फीसदी लोगों ने समस्या के रूप में गिनाया है. यानी पूरे विधानसभा चुनाव में यही पांच बड़े फैक्टर असर डालेंगे और राजनीतिक माहौल में छाए रहने की उम्मीद है.
हाल ही में जम्मू कश्मीर में लोकसभा चुनाव हुए हैं. यहां लोकसभा की कुल 5 सीटें हैं. बीजेपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 2-2 सीटें जीती हैं. एक सीट बारामूला में अवामी इत्तेहाद पार्टी प्रमुख राशिद इंजीनियर ने जीत हासिल की. उन्होंने उमर अब्दुल्ला को हराया है.सर्वे के मुताबिक, अगर आज चुनाव हुए तो बीजेपी-नेशनल कॉन्फ्रेंस पिछला प्रदर्शन दोहरा सकती है. हालांकि, राशिद इंजीनियर को झटका लग सकता है और ये सीट पीडीपी के हाथ आ सकती है. कांग्रेस को फिर सफलता मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही है.
2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के आधार पर प्रदर्शन देखें तो 29 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी ने बढ़त बनाई. 34 विधानसभा क्षेत्रों में नेशनल कॉन्फ्रेंस और 7 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस ने बढ़त बनाई है. 5 विधानसभा क्षेत्र में पीडीपी, 14 विधानसभा क्षेत्रों में इंजीनियर राशिद और 1 विधानसभा सीट में सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने बढ़त बनाई.
जम्मू कश्मीर में राशिद इंजीनियर की अवामी इत्तेहाद पार्टी, मोहम्मद अल्ताफ बुखारी की जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी गुलाम नबी आजादी की डेमोक्रेटिक प्रगतिशील आजाद पार्टी, सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी विधानसभा चुनाव में गेमचेंजर साबित हो सकती है. इसके अलावा नेशनल कांफ्रेंस भी यहां की पॉलिटिक्स में खासा दखल रखती है. राज्य में तीन बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां बीजेपी, कांग्रेस और बसपा भी सक्रिय है. इस बार चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस का अलायंस हो गया है.
जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस इस बार मजबूती से उतरने की तैयारी में है. इस अलायंस की सीधे तौर पर बीजेपी और पीडीपी से लड़ाई देखने को मिल सकती है. पीडीपी समेत अन्य क्षेत्रीय दल भी जोर लगा रहे हैं और चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं. क्षेत्रीय दलों को गेमचेंजर के तौर पर देखा जा रहा है. राज्य में कुल 90 सीटें हैं. क्षेत्रीय दल अलग-अलग संभागों में प्रभावशाली हैं. क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदर्शन ही नई सरकार में उनकी भूमिका तय करेगा.
राशिद इंजीनियर को इंजीनियर राशिद के नाम से भी जाना जाता है. कश्मीर घाटी के कुपवाड़ा जिले में मजबूत आधार रखते हैं. उनके नेतृत्व वाली ‘आवामी इत्तेहाद पार्टी’ ने पहले भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की है और उनका समर्थन क्षेत्रीय मुद्दों पर आधारित है. राशिद इंजीनियर को युवाओं और गैर-पारंपरिक वोटरों का समर्थन मिलता है, जो मुख्यधारा के दलों से निराश माने जाते हैं.
अल्ताफ बुखारी ने हाल ही में ‘जम्मू और कश्मीर अपना दल’ नाम की पार्टी बनाई है. बुखारी के पास प्रशासनिक अनुभव है और उन्होंने पहले पीडीपी के साथ भी काम किया है. बुखारी की पार्टी का दृष्टिकोण मध्यमार्गी है, जो उन्हें ना सिर्फ कश्मीर घाटी में, बल्कि जम्मू क्षेत्र में भी वोटरों को आकर्षित करने में मदद कर सकता है. उनकी पार्टी आर्थिक विकास, रोजगार और शांति के मुद्दों पर केंद्रित है.
गुलाम नबी आजाद अनुभवी नेता हैं. वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे हैं. उन्होंने हाल ही में अपनी पार्टी ‘डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी’ बनाई है. आजाद का राजनीतिक अनुभव और उनकी प्रतिष्ठा उन्हें एक मजबूत बनाती है. आजाद की पार्टी का दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष और समावेशी है, जो उन्हें जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों में वोटरों का समर्थन दिला सकता है. उनके पास जम्मू क्षेत्र में भी मजबूत आधार है, जिससे वे चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं.
अनुच्छेद 370 की बहाली: जम्मू कश्मीर में कई नेता अनुच्छेद 370 की बहाली और राज्य के विशेष दर्जे पर अपने-अपने दृष्टिकोण रखते आ रहे हैं, जो कश्मीर घाटी में महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा हो सकता है. आर्थिक विकास, शांति और स्थिरता के मुद्दों पर राज्य के नेता जोर दे रहे हैं और उनके लिए यह एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है. खासकर उन वोटरों के लिए जो मुख्यधारा की पार्टियों से निराश हैं.
वोटर्स का ध्रुवीकरण: इन नेताओं की पार्टियां मुख्यधारा की पार्टियों से वोटर्स को विभाजित कर सकती हैं, जिससे चुनावी गणित और समीकरण बदल सकते हैं. अगर इन पार्टियों ने अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया तो वे चुनावों में और भी बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.
फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला: फारूक नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख हैं और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला पार्टी के उपाध्यक्ष हैं. दोनों नेताओं का कश्मीर घाटी में मजबूत समर्थन है. अनुच्छेद 370 के हटने के बाद इनकी भूमिका और इनके रुख से कश्मीरी लोगों में इनकी स्वीकार्यता और भविष्य की राजनीति में इनका प्रभाव देखने को मिल सकता है.
महबूबा मुफ्ती (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी): महबूबा की पार्टी घाटी के दक्षिणी हिस्सों में प्रभावशाली है. अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर पीडीपी की पार्टी की आक्रामकता और केंद्र सरकार के खिलाफ बयानबाजी उन्हें कश्मीरी अलगाववादी विचारधारा के करीब लाती है, जिससे उनके समर्थकों का आधार बना रहता है.
सज्जाद लोन (पीपुल्स कॉन्फ्रेंस): सज्जाद लोन कश्मीर के उत्तर में प्रभावी नेता हैं और उनकी पार्टी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अच्छी पकड़ रखती है. वे पारंपरिक राजनीतिक दलों के खिलाफ एक विकल्प के रूप में उभर रहे हैं और उनकी भूमिका अगले चुनावों में महत्वपूर्ण हो सकती है.
बीजेपी जम्मू क्षेत्र में मजबूत है और इस क्षेत्र के हिंदू मतदाताओं को अपना मजबूत समर्थन देती है. अनुच्छेद 370 के हटने के बाद बीजेपी ने कश्मीर घाटी में भी अपनी पकड़ बनाने की कोशिश की है. चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर के चुनावी समीकरण को बदल सकता है. परिसीमन के बाद जम्मू संभाग में छह और सीटें जुड़ जाने से राजनीतिक महत्व बढ़ गया है. जम्मू में कुल सीटों की संख्या 43 हो गई है. पहले इस क्षेत्र में 37 सीटें थीं. इसी तरह कश्मीर संभाग में पहले 46 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 47 हो गईं हैं. बीजेपी इस समायोजन का श्रेय ले रही है.