दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक फ्लाईओवर की मरम्मत के संबंध में दिल्ली सरकार के दो विभागों के बीच फंड विवाद पर नाराजगी व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि चाहे फंड पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम (टीटीडीसी) की ओर से दिया गया हो या पीडब्ल्यूडी की ओर से दिया गया हो। अंतत: इसका बोझ दिल्ली सरकार को ही उठाना होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि आप यह तो मान रहे हैं कि इस फ्लाईओवर में स्ट्रक्चरल खामियां हैं। कल यदि यह गिर गया तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? कौन इसकी जिम्मेदारी लेगा? जब आप मान रहे हैं कि यह जनता के लिए असुरक्षित है, तो इस मामले में किसी वित्तीय या तकनीकी मुद्दे का सवाल ही कहां उठता है? सुरक्षा सर्वोपरि है। मानव जीवन सबसे महत्वपूर्ण है।
पीडब्ल्यूडी के वकील ने पीठ को बताया कि चूंकि शुरुआती निर्माण टीटीडीसी ने 2015 में किया था, इसलिए उसे जल्द से जल्द फ्लाईओवर की मरम्मत करनी थी। वहीं टीटीडीसी के वकील ने दलील दी कि वह फंड के लिए पीडब्ल्यूडी पर निर्भर है। उन्होंने अदालत को बताया कि ठेकेदार को 8 करोड़ रुपये की रकम का पेमेंट करना था जिसका भुगतान पीडब्ल्यूडी ने नहीं किया।
पीठ ने कहा कि अदालत यह नहीं समझ पा रही है कि दिल्ली सरकार के ही दो विभाग एक-दूसरे का विरोध क्यों कर रहे हैं। खासकर तब जब सभी मान रहे हैं कि फ्लाईओवर आम लोगों के लिए असुरक्षित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पैसा किस विभाग से आया। लब्बोलुबाब तो यह कि मरम्मत का खर्च दिल्ली सरकार पर ही पड़ेगा। फिर यह विवाद क्यों? मरम्मत के काम में देरी क्यों? याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने कहा कि दोनों विभाग अपना दायित्व बदल रहे हैं, जिससे जनता को असुविधा हो रही है।