बटेंगे तो कटेंगे; झारखंड में फायदे की जगह कैसे BJP को नुकसान ही पहुंचा गया नारा

बंटेंगे तो कटेंगे…; यह वह नारा है जो झारखंड के विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक सुनाई दिया। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से दिए गए इस नारे को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सभी नेताओं ने जोरशोर से उछाला पूरे चुनाव को इस पर केंद्रित करने की कोशिश की। हालांकि, नतीजों के विश्लेषण से पता चलता है कि फायदे की बजाय यह नारा उसके लिए नुकसानदायक ही साबित हुआ।

जिस संथाल परगना को ध्यान में रखकर भाजपा ने इस नारे का इतना प्रयोग किया वहां भगवा पार्टी महज एक सीट पर जीत हासिल कर पाई। संथाल परगना में विधानसभा की 18 सीटें आती हैं। एक को छोड़कर सभी सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और आरजेडी गठबंधन ने जीत हासिल की है। राजमहल में झामुमो के ताजुद्दीन, बोरियों से झामुमो के धनंजय सोरेन, महेशपुर से स्टीफन मरांडी, शिकारीपाड़ा से आलोक कुमार सोरेन, दुमका से बसंत सोरेन, जामा से लुईस मरांडी, नाला से रबिंद्रनाथ महतो जैसे नेताओं ने जीत हासिल की। भाजपा को केवल जरमुंडी सीट पर जीत हासिल हुई।

भाजपा ने बढ़कर इस बात को प्रचारित किया कि संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठ की वजह से मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है तो आदिवासी समुदाय की हिस्सेदारी जनसंख्या में कम हो रही है। भाजपा का दावा है कि 1951 से 2011 के बीच यहां हिंदुओं की आबादी 22 फीसदी कम हो गई है तो मुस्लिम आबादी 14 फीसदी बढ़ गई है। इन आंकड़ों के साथ भाजपा ने घुसपैठियों से रोटी, बेटी और माटी बचाने का भी नारा दिया था।

जानकारों की मानें तो आदिवासी और मुस्लिम बहुल संथाल परगना में ‘कटेंगे तो बटेंगे’ नारा भाजपा के लिए नुकशानदायक साबित हुआ। माना जा रहा है कि भाजपा ने यहां हिंदू वोटर्स को एकजुट करने की कोशिश की, लेकिन इस नारे के बाद ध्रुवीकरण का जो माहौल तैयार हुआ उसमें मुस्लिम मतदाताओं ने और अधिक एकजुट होकर ‘इंडिया’ गठबंधन के पक्ष में वोट किया। इसके अलावा आदिवासी वोटर्स को हेमंत सोरेन ने सफलतापूर्वक अपने पाले में बनाए रखा। आदिवासी आबादी किस तरह झामुमो के पक्ष में रही इसका अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि एक को छोड़कर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 27 सीटों पर इंडिया गठबंधन ने जीत हासिल की है।

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