मिलेट्स खेती दंतेवाड़ा
दंतेवाड़ा में मिलेट्स उत्पादन की नई दिशा: किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल
रायपुर: मिलेट्स (मोटा अनाज) की खेती, जो कम लागत, कम पानी, और बिना रसायनों के होती है, अब किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक शानदार साधन बन रही है। दंतेवाड़ा जिला अब इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यहां की भूमि, जो पहले बंजर मानी जाती थी, अब मिलेट्स जैसे पौष्टिक अनाजों के उत्पादन के लिए उपयुक्त बन रही है।
मिलेट्स की खेती: कम लागत और अधिक लाभ
मिलेट्स की खेती 80-90 दिनों में तैयार हो जाती है, और इसे ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी जैसी फसलों के रूप में उगाया जाता है। ये फसलें बंजर या कम उपजाऊ भूमि में भी उगाई जा सकती हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलता है। इन फसलों को उगाने में लागत कम होती है, पानी की आवश्यकता भी कम होती है और रासायनिक उर्वरकों का भी उपयोग नहीं करना पड़ता।
दंतेवाड़ा में रागी उत्पादन की नई पहल
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के तहत दंतेवाड़ा जिले में मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष पहल की जा रही है। जिला प्रशासन और कृषि विभाग के प्रयासों से अब किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। यह पहल किसानों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में मदद कर रही है।
श्री विधि पद्धति से रागी की खेती
दंतेवाड़ा के प्रगतिशील किसानों ने पहली बार ‘श्री विधि’ से रागी (मडिया) की खेती शुरू की है। यह विधि किसानों को अधिक उत्पादन के साथ-साथ कम लागत में फायदा पहुंचा रही है। रागी एक अत्यधिक पोषक अनाज है, जिसमें कैल्शियम और आयरन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है, जो विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए लाभकारी है।
आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण
कृषि विभाग और भूमगादी टीम गांव-गांव जाकर किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे रही है। किसानों को बुवाई की विधि, पौधों के बीच उचित दूरी, जैविक खाद का उपयोग, और फसल प्रबंधन के बारे में जानकारी दी जा रही है। इसके कारण किसान अब अधिक उत्साह के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों को अपना रहे हैं, जिससे उनकी उत्पादकता में वृद्धि हो रही है।
जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा
‘श्री विधि’ से रागी की खेती से जैविक और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा मिल रहा है। इस विधि में बीज कम लगता है, जिससे लागत घटती है और पारंपरिक खेती की तुलना में पानी की आवश्यकता भी कम होती है, जो विशेष रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए बेहद लाभकारी है। यह विधि मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में मदद करती है, जिससे लंबे समय तक खेती की गुणवत्ता बनी रहती है।
बहुफसली प्रणाली को बढ़ावा
दंतेवाड़ा जिले में केवल रागी ही नहीं, बल्कि कोदो-कुटकी, ज्वार, बाजरा, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी अन्य फसलों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। कृषि विभाग किसानों को बहुफसली प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है ताकि उनकी आय के स्रोत बढ़ सकें और खेती अधिक टिकाऊ बन सके।
नए अवसर और आर्थिक सुधार
इस पहल से दंतेवाड़ा के किसान पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का संतुलित उपयोग करते हुए कृषि में नई पहचान बना रहे हैं। मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा मिलने से न केवल किसानों की आय बढ़ने की संभावना है, बल्कि पोषण सुरक्षा और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।
उपसंहार:
दंतेवाड़ा में मिलेट्स की खेती एक नई दिशा में बढ़ रही है, जो न केवल किसानों के लिए आर्थिक सुधार ला रही है, बल्कि पोषण सुरक्षा और सतत कृषि के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रही है। इस पहल के साथ, दंतेवाड़ा जिले के किसान आत्मनिर्भर और सशक्त बन रहे हैं।