नक्सली हमले में शहीद जवान की मां को पेंशन न देना अन्याय: हाई कोर्ट ने सरकार को 6 हफ्ते का समय दिया
रायपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नक्सली हमले में शहीद हुए पुलिस कांस्टेबल की 68 वर्षीय मां को पारिवारिक पेंशन से वंचित किए जाने को घोर अन्याय करार दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर मामले में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता फिलिसिता लकरा के 21 वर्षीय पुत्र इग्नेशियस लकरा वर्ष 2002 में सूरजपुर जिले में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। वे छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (CAF) की 10वीं बटालियन में कांस्टेबल थे।
शहादत के बाद उनके पिता लोबिन को पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। लेकिन अगस्त 2020 में पिता के निधन के बाद जशपुर कोषागार कार्यालय ने पेंशन बंद कर दी। लगातार प्रयासों के बावजूद राहत न मिलने पर 2021 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।
कोर्ट में क्या हुआ?
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 11 फरवरी को सुनवाई करते हुए कहा कि मृतक कर्मचारी की माता को पेंशन से वंचित करना अन्यायपूर्ण है।
अदालत ने टिप्पणी की कि:
- 1963 के सिविल सेवा नियमों में पिता की मृत्यु के बाद माता को पेंशन देने का प्रावधान है।
- 1965 के पुलिस पेंशन नियमों में ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं होना भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
- 1970 की अधिसूचना द्वारा जोड़ा गया संशोधन 1965 के नियमों का भी हिस्सा माना जाना चाहिए।
सरकार की दलील
राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता प्रसून कुमार भादुरी ने तर्क दिया कि 1965 के नियम पुलिस कर्मियों के लिए विशेष नियम हैं और विशेष नियम सामान्य नियमों पर प्रभावी होते हैं।
उन्होंने कहा कि नियम 5(5)(iv) के अनुसार पेंशन वितरण का प्रावधान सीमित है और पहले प्राप्तकर्ता की मृत्यु के बाद अन्य सदस्य को पेंशन देने का प्रावधान नहीं है।
हाई कोर्ट का निर्देश
अदालत ने स्पष्ट कहा कि:
“मृतक कर्मचारी की माता को पेंशन से वंचित करना घोर अन्याय है, विशेषकर तब जब उसके पुत्र ने नक्सली हमले में शहादत दी हो।”
कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के मामले पर पुनर्विचार कर निर्णय लें।
क्या है इस फैसले का महत्व?
- शहीद जवानों के परिवारों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर
- पेंशन नियमों की व्याख्या में समानता और न्याय का सिद्धांत
- भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल
यह फैसला न केवल एक मां को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि शहीदों के परिजनों के अधिकारों को लेकर न्यायपालिका के संवेदनशील रुख को भी दर्शाता है।