5 को जमानत पर खालिद और शरजील को क्यों नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मानी ‘आतंक’ वाली वह बात

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़े और अहम फैसले में दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को राहत दी, लेकिन दो सबसे चर्चित आरोपियों को जमानत देने से इनकार किया। अदालत ने उन पर लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यह फैसला दिया। अदालत ने दिल्ली पुलिस उस दलील को भी स्वीकार किया जिसमें उनके कृत्य को आतंकवाद करार दिया गया था।

10 दिसंबर को सुनवाई पूरी होने के बाद जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को सुनाए गए फैसले में जस्टिस कुमार ने यूएपीए की धारा 15 की रूपरेखा और उसके लागू होने के दायरे पर प्रकाश डाला, जिसमें ‘आतंकी कृत्य’ की परिभाषा दी गई है। उन्होंने कहा कि मौत या संपत्ति के विनाश के अलावा यह प्रावधान ऐसे कृत्यों को भी अपने दायरे में लाता है जो आवश्यक सेवाओं को बाधित करें या देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करें।

दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि यह दंगा स्वत: स्फूर्त नहीं था, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता पर पूर्व-नियोजित और सुनियोजित एक हमला था। दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का प्रयास किया गया था और यह महज संशोधित नागरिकता अधिनियम (सीएए) के खिलाफ आंदोलन नहीं था। मेहता ने दलील दी कि यह एक ‘मिथक’ है कि सीएए/एनआरसी को लेकर प्रदर्शन के बाद यह एक स्वतःस्फूर्त दंगा था। उन्होंने इमाम के एक भाषण का हवाला भी दिया, जिसमें उन्होंने (इमाम ने) कथित तौर पर कहा था कि आबादी में 30 प्रतिशत की भागीदारी रखने वाले मुस्लिम सशस्त्र विद्रोह के लिए एकजुट नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘भाषण-दर-भाषण, बयान-दर-बयान, समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश थी। यह केवल किसी कानून के विरुद्ध आंदोलन नहीं था।’ मेहता ने दलील दी, ‘शरजील इमाम ने कहा था कि उसकी दिली ख्वाहिश है कि हर उस शहर में ‘चक्का जाम’ हो, जहां मुसलमान रहते हैं। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं।’

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