मध्यप्रदेश दूषित पेयजल
MP के गांवों में पानी नहीं, ख़तरा बह रहा है
मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पीने का पानी अब जीवनदायिनी नहीं, बल्कि एक खामोश स्वास्थ्य संकट बन चुका है। केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन की ताज़ा Functionality Assessment Report ने राज्य की जमीनी हकीकत को बेनकाब कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक हर तीसरा गिलास पानी ऐसा है जिसे इंसान सुरक्षित रूप से नहीं पी सकता।
सितंबर–अक्टूबर 2024 के दौरान राज्य के 15,000 से अधिक ग्रामीण घरों से लिए गए पानी के सैंपल की जांच की गई। नतीजे चौंकाने वाले हैं।
रिपोर्ट के सबसे डरावने आंकड़े
- मध्यप्रदेश में सिर्फ 63.3% पेयजल सैंपल ही गुणवत्ता जांच में पास हुए
- 36.7% सैंपल असुरक्षित पाए गए
- राष्ट्रीय औसत 76% है, यानी MP काफी पीछे
- पानी में बैक्टीरिया और रासायनिक प्रदूषण दोनों मौजूद
यह साफ संकेत है कि समस्या सिर्फ व्यवस्था की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की है।
जहां इलाज होना चाहिए, वहीं ज़हर
सबसे चिंताजनक हालात उन जगहों पर हैं जहां लोगों की जान बचाई जानी चाहिए:
- सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 12% पानी सैंपल पास
- देश का औसत: 83.1%
- मतलब MP के 88% अस्पतालों में दूषित पानी
- स्कूलों में 26.7% सैंपल फेल, यानी बच्चे रोज़ असुरक्षित पानी पी रहे हैं
यह आंकड़े सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य पर हमला हैं।
आदिवासी इलाकों में हालात सबसे बदतर
आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति और भी भयावह है:
- अनूपपुर और डिंडौरी: एक भी सुरक्षित सैंपल नहीं
- बालाघाट, बैतूल, छिंदवाड़ा: 50% से ज्यादा सैंपल दूषित
जहां पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, वहां यह संकट जानलेवा साबित हो रहा है।
नल हैं, पाइप हैं… लेकिन सुरक्षित पानी नहीं
जल जीवन मिशन के तहत ढांचा तो खड़ा हुआ, लेकिन गुणवत्ता गायब हो गई:
- देश में 78% घरों में नल जल कनेक्शन
- मध्यप्रदेश में सिर्फ 31.5% घरों में काम करने वाला नल
- राष्ट्रीय औसत: 70.9%
स्थिति यह है कि:
- 99.1% गांवों में पाइपलाइन
- लेकिन सिर्फ 76.6% घरों में नल चालू
यानी हर चौथा घर पानी से वंचित या दूषित पानी पीने को मजबूर।
इंदौर: 100% कनेक्शन, सिर्फ 33% सुरक्षित पानी
इंदौर को 100% कवर घोषित किया गया, लेकिन सच्चाई यह है कि:
- सिर्फ 33% घरों को ही पीने लायक पानी मिल रहा है
- भागीरथपुरा इलाके में 18 लोगों की मौत
- 429 लोग अस्पताल में भर्ती, कई ICU और वेंटिलेटर पर
यह घटना सिस्टम की कीमत इंसानी जान से चुकाने का उदाहरण है।
हाईकोर्ट ने माना “जन स्वास्थ्य आपातकाल”
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस हालात को जन स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करते हुए कहा:
“अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पेयजल का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।”
केंद्र सरकार ने भी चेतावनी दी है कि 2026 में फंडिंग घट सकती है अगर गुणवत्ता नहीं सुधरी।