इंडिया गठबंधन में घिर गए हैं राहुल गांधी, क्या चक्रव्यूह तोड़ पाएंगे?

राजनीति भी एक शो बिजनेस की तरह है. जिस तरह से एक सफलता हजारों रास्तों के द्वार खोलती है उसी तरह एक फ्लॉप एक्ट घोर अंधकार की ओर ले जाता है. लोकसभा चुनावों में मिली आंशिक सफलता के बाद राहुल गांधी को भविष्य का पीएम घोषित करने वालों की कमी नहीं थी. पर हरियाणा और जम्मू-कश्‍मीर में कांग्रेस को मिली हार से वो अपनों के बीच ही घिर गए हैं. इंडिया गठबंधन के साथी ही उन पर हमले कर रहे हैं. गठबंधन के सहयोगी दलों ने बुधवार को कांग्रेस पार्टी पर दबाव बढ़ा दिया. आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, शिवसेन यूबीटी, टीएमसी और डीएमके तक ने कांग्रेस पर अड़ियल रवैया अपनाकर गठबंधन को कमजोर करने का आरोप लगाया है. अब सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी इंडिया गठबंधन में घिर गए हैं. क्या अब उनके पास इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं है.क्या वो सहयोगी पार्टियों के दबाव में रहेंगे. क्या इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की मोनोपोली कम होगी. क्या सहयोगी पार्टियां कांग्रेस से अधिक कुर्बानी नहीं मांग रही हैं?

हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों को लगभग बराबर वोट  मिले हैं.भाजपा ने 39.94% वोट शेयर हासिल किया, जबकि कांग्रेस (CPM के साथ) ने 39.34% वोट शेयर हासिल किया.जबकि AAP ने लगभग 1.8% वोट शेयर दर्ज किया.हरियाणा में कई ऐसी सीटें हैं जहां कांग्रेस कैंडिडेट्स को आम आदमी पार्टी के वोटों को चलते हारना पड़ा है. राहुल गांधी इस बात को जानते थे. एक पार्टी के नेता के हैसियत से उन्होंने सार्वजनिक बयान दिया कि कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावना को तलाशना चाहिए. पर हरियाणा की स्थानीय कांग्रेस इकाई ने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने से मना कर दिया .विरोध करने वालों में हरियाणा कांग्रेस के सभी गुट शामिल थे. मतलब यहां पर हुड्डा पित-पुत्र पर आरोप लगाकर बचा नहीं जा सकता. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से बातचीत भी की थी. पर मामला बना नहीं. इसलिए आम आदमी पार्टी से गठबंधन न होने का दोष कांग्रेस पर मढना कहीं से भी उचित नहीं है. आम आदमी पार्टी की डिमांड हरियाणा में उसकी कूवत से ज्यादे थी इस पर क्यों नहीं कोई चर्चा कर रहा है.कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का वोट शेयर बताता है कि किसकी वजह से हरियाणा में गठबंधन नहीं हो सका

उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर होने वाले उपचुनावों के लिए बुधवार को सपा ने 6 सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए. स्पष्ट रूप से यह कांग्रेस को चैलेंज करने जैसा है. जब  उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन में लोकसभा चुनाव लड़ा गया था तो सपा को थोड़ा इंतजार करना चाहिए. वो भी हरियाणा में जिस दिन इतना बड़ा सेटबैक मिला उस दिन पार्टी प्रत्याशियों की घोषणा करना सिवाय कांग्रेस को नीचा दिखाने के और कुछ हो ही नहीं सकता है. अभी उपचुनाव की तारीखों की घोषणा भी नहीं हुई है. इतनी भी क्या जल्दी थी. क्या यह कांग्रेस को ब्लेकमेल करने की नियत से नहीं किया गया होगा ?  करहल, सिसामऊ, फूलपुर, मिल्कीपुर, कटेहरी और मझवां सीटों पर प्रत्याशी घोषित करके संकेत दिया कि राज्य में कांग्रेस पार्टी की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर हो गई है.क्योंकि मझवां सीट पर कांग्रेस की नजर थी. कांग्रेस पश्चिमी यूपी में मीरापुर और पूर्वी यूपी में फूलपुर से भी चुनाव लड़ना चाहती है.

सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अशोक यादव ने हालांकि कहा कि प्रत्याशियों की घोषणा इसलिए की गई ताकि उन्हें चुनाव की तैयारी के लिए समय मिल सके. उन्होंने कहा, हम कांग्रेस को समायोजित करने की कोशिश करेंगे. मतलब कांग्रेस जैसी देश की दूसरे नंबर की पार्टी को एक क्षेत्रिय पार्टी समायोजित करने की बात कर रही है. मतलब दया करके कुछ सीट दे दी जाएगी. जबकि समाजवादी पार्टी को भी लोकसभा में जो बहुमत मिला था उसमें कांग्रेस के साथ गठबंधन का बहुत योगदान था. अखिलेश  यादव की आज की स्थिति में एक बार बिना कांग्रेस के साथ गठबंधन के चुनाव लड़कर देख लें . पार्टी की हार तय होगी. लोकसभा चुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी के साथ दलितों का आना केवल उनके पीडीए फॉर्मूले के वजह से नहीं था . उसमें कांग्रेस का बहुत बड़ा रोल था. क्योंकि दलित कांग्रेस को अपनी स्वाभाविक पार्टी मानते हैं.उत्तर प्रदेश का दलित कभी यादव डॉमिनेंट वाली समाजवादी पार्टी के साथ जा ही नहीं सकते .  

हरियाणा में कांग्रेस की हार के बाद पार्टी को टार्गेट पर लेने वालों में सबसे आगे शिवसेना यूबीटी है. राहुल गांधी से उद्धव ठाकरे की चिढ़ की कई वजहें हैं. उद्धव ठाकरे चाहते थे कि महाविकास आघाड़ी की तरफ से उनको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाये. शरद पवार तो तैयार नहीं ही हुए, राहुल गांधी ने भी उनकी कोई मदद नहीं की. सिर्फ इसी काम के लिए वो बेटे और साथी संजय राउत के साथ दिल्ली भी आये थे.पर उद्धव ठाकरे को क्यों सीएम पद ही चाहिए. भारतीय जनता पार्टी के साथ भी कम सीट होने के बावजूद वो सीएम पद ही चाहते थे.उद्धव ठाकरे को ये नहीं भूलना चाहिये कि लोकसभा चुनाव के जिन नतीजों को लेकर वो बोलने लायक हुए हैं, उसमें कांग्रेस का प्रदर्शन उनकी और शरद पवार की पार्टी दोनो के मुकाबले बहुत बेहतर रहा है.

बुधवार को, शिवसेना (यूबीटी) ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उसने हरियाणा में आप और सपा को सीटें न देकर गलती की. पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में कहा गया कि स्थानीय कांग्रेस नेताओं के अतिआत्मविश्वास और घमंड ने हरियाणा में हार के लिए भूमिका निभाई. शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने कहा, कांग्रेस को लगा कि वह अकेले जीत सकती है और कोई सत्ता में भागीदार नहीं बनेगा. 

इंडिया गठबंधन के जो दल कांग्रेस की हरियाणा हार के चलते ब्लेकमेलिंग पर उतारू हो गए हैं उन्हें समझना होगा कि वो गलती कर रहे हैं. कांग्रेस की हार के पीछे उसकी लोकप्रियता में गिरावट नहीं है. कांग्रेस को मिले वोट शेयर बताते हैं कि पार्टी पर लोगों का भरोसा बढ़ा है. कांग्रेस का आधार बहुत बड़ा है. देश की आजादी से पहले से मौजूद पार्टी लोगों के डीएनए में शामिल हो चुकी है. जब लोग बीजेपी से नाराज होंगे तो सबसे पहले कांग्रेस का ही दामन थामेंगे. उत्तर प्रदेश हो या दिल्ली, महाराष्ट्र हो बंगाल कांग्रेस का आधार सबसे बड़ा है.बीजेपी अपने पोलिटिकल मैनेजमेंट से जैसे हरियाणा जीत ली उसी तरह इंडिया गठबंधन में फूट भी करा सकती है.

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