“बारनवापारा अभयारण्य में चौंकाने वाली वापसी: वर्षों बाद दिखा दुर्लभ ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन, कैमरे में हुआ कैद”

ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन


बारनवापारा अभयारण्य में पक्षी प्रेमियों के लिए बड़ी खुशखबरी

रायपुर।
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य से पक्षी प्रेमियों, प्रकृति विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक खबर सामने आई है। हाल ही में अभयारण्य में आयोजित बर्ड सर्वे के दौरान अत्यंत दुर्लभ पक्षी ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन (Treron bicinctus) की उपस्थिति दर्ज की गई है। यह प्रजाति वर्षों बाद इस क्षेत्र में देखी गई है, जिसे वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।


8–10 वर्षों बाद फिर दर्ज हुई मौजूदगी

ऐतिहासिक रूप से बारनवापारा अभयारण्य में इस पक्षी की उपस्थिति पहले भी दर्ज की जा चुकी है। वर्ष 2015–16 में प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ ए.एम.के. भरोस द्वारा इसकी साइटिंग की गई थी। इसके बाद लंबे समय तक यह प्रजाति यहाँ नजर नहीं आई, जिससे यह माना जाने लगा था कि यह क्षेत्र से विलुप्त हो चुकी है।
अब इतने वर्षों बाद ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन की पुनः वापसी यह संकेत देती है कि अभयारण्य का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ और संतुलित बना हुआ है।


बर्ड सर्वे टीम को मिली बड़ी सफलता

इस दुर्लभ पक्षी की साइटिंग पकरीद टीम द्वारा की गई, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए अनुभवी बर्डर्स और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर शामिल थे। टीम में प्रमुख रूप से—

  • राजू वर्मा (वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर)
  • प्रतीक ठाकुर
  • कर्नाटक, बिहार और ओडिशा से आए पक्षी विशेषज्ञ

शामिल थे।

टीम को उस समय बड़ी सफलता मिली जब इस पक्षी का एक जोड़ा उनके ठीक ऊपर एक पेड़ पर बैठा हुआ दिखाई दिया। इससे पहले कि पक्षी उड़ पाते, टीम ने उसकी विस्तृत फोटोग्राफी और वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली, जो वैज्ञानिक और प्रलेखन दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।


क्यों है यह साइटिंग इतनी खास?

इस साइटिंग का महत्व कई कारणों से है—

  • यह प्रजाति कई वर्षों बाद इस क्षेत्र में देखी गई
  • इसकी मौजूदगी जैव विविधता की मजबूती को दर्शाती है
  • यह अभयारण्य में पक्षियों के अनुकूल वातावरण का प्रमाण है
  • भविष्य के संरक्षण प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध कराती है

ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन: एक परिचय

ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में पाया जाता है। यह मुख्यतः—

  • अंजीर
  • जंगल के अन्य रसीले फल

पर निर्भर रहने वाला पक्षी है। इसे एक निवासी प्रजाति माना जाता है, जो स्थानीय मौसमी बदलावों के अनुसार अपनी गतिविधियां संचालित करता है।

छत्तीसगढ़ के कुछ अन्य वन क्षेत्रों में इसकी उपस्थिति समय-समय पर दर्ज की गई है, लेकिन बारनवापारा अभयारण्य में इसकी वापसी विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जा रही है।


विशिष्ट शारीरिक पहचान

सर्वे टीम ने इस पक्षी की पहचान इसकी विशिष्ट शारीरिक बनावट के आधार पर की—

  • नीली-धूसर रंग की गर्दन
  • पीले-हरे रंग का सिर और शरीर का निचला हिस्सा
  • लाल रंग के पैर
  • स्लेटी-धूसर केंद्रीय पूंछ पंख

यह विशेषताएं इसे आमतौर पर दिखने वाले येलो-फुटेड ग्रीन पिजन (हरियल) से स्पष्ट रूप से अलग करती हैं।
विशेष रूप से नर पक्षी के सीने पर मौजूद गहरे नारंगी रंग का पैच इसकी सबसे प्रमुख पहचान है।


संरक्षण के लिए सकारात्मक संकेत

कई वर्षों बाद इस दुर्लभ प्रजाति का कैमरे में कैद होना न केवल फोटोग्राफर्स के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बारनवापारा अभयारण्य का वन तंत्र पक्षियों के संरक्षण के लिए अनुकूल बना हुआ है।
यह साइटिंग आने वाले समय में संरक्षण नीतियों और वैज्ञानिक अध्ययनों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करेगी।

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