सबई घास बनी आत्मनिर्भरता की डोर: वनधन केंद्र केड़ना ने बदली ग्रामीण महिलाओं की किस्मत


सबई घास से रस्सी निर्माण


📰 पूरा लेख (विशेष रिपोर्ट | 400+ शब्द)

रायपुर।
ग्रामीण अंचलों में जब सीमित संसाधनों के बावजूद स्थानीय ज्ञान, प्राकृतिक संपदा और सरकारी योजनाओं का सही तालमेल बैठता है, तब आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रखी जाती है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल है रायगढ़ जिले के धर्मजयगढ़ वनमंडल अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना, जहां सबई घास से रस्सी निर्माण ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक और सामाजिक बदलाव की नई कहानी लिख दी है।


🌾 जंगल की घास बनी आजीविका का साधन

सबई घास रायगढ़ जिले के कई वन क्षेत्रों जैसे:

  • कृजमझोर
  • केड़ना
  • सोलमुड़ा
  • सोरझुड़ा
  • अन्नोला
  • पेलमा

में प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। परंपरागत रूप से ग्रामीण महिलाएं इससे हाथ से रस्सी बनाती थीं, जिसका उपयोग घरेलू कामों या स्थानीय बाजारों तक सीमित रहता था। उचित बाजार, तकनीक और सही मूल्य के अभाव में यह मेहनत स्थायी आय का जरिया नहीं बन पा रही थी


🤝 वनधन योजना से मिला नया सहारा

इसी समस्या को दूर करने के लिए राज्य सरकार की वनधन योजना के तहत वनधन विकास केंद्र केड़ना की स्थापना की गई। इस पहल के अंतर्गत:

  • महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोड़ा गया
  • सबई घास से रस्सी निर्माण के लिए
    • हाथ से चलने वाली
    • और विद्युत चालित मशीनें उपलब्ध कराई गईं
  • व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर
    • उत्पादन क्षमता
    • गुणवत्ता
    • और समय दक्षता में सुधार किया गया

इससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उनका श्रम बाजार से सीधे जुड़ सका।


💰 नियमित आय और सुनिश्चित बाजार

सबई घास से बनी रस्सी का उपयोग मुख्य रूप से:

  • बांस के बंडलों को बांधने में
  • वन विभाग और पेपर उद्योग में

किया जाता है, जहां इसकी मांग लगातार बनी रहती है।

वन विभाग द्वारा:

  • महिलाओं से रस्सी ₹45 प्रति किलो की दर से खरीदी जाती है
  • तैयार रस्सी को विभिन्न वनमंडलों में ₹75 प्रति किलो में विक्रय किया जाता है

इससे:

  • महिलाओं को नियमित मजदूरी
  • और वनधन केंद्र को आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा है।

📊 आय के आंकड़े बताते हैं सफलता की कहानी

अधिकारियों के अनुसार:

  • पिछले वर्षों में
    • 30 से 40 क्विंटल रस्सी का निर्माण
    • महिलाओं ने ₹1.5 से 2 लाख की आय अर्जित की
  • वर्ष 2025-26 में
    • 150 क्विंटल रस्सी निर्माण का लक्ष्य
    • अनुमानित आय ₹7 से 8 लाख
  • मार्च 2026 तक
    • कुल ₹11.25 लाख मूल्य की रस्सी
    • जिसमें से ₹7.50 लाख मजदूरी के रूप में ग्रामीणों को मिलने की संभावना है।

🌍 ईको-फ्रेंडली मॉडल, पर्यावरण भी सुरक्षित

यह पूरी परियोजना पर्यावरण के अनुकूल है।

  • सबई घास का विनाश-रहित दोहन
  • जंगलों का संरक्षण
  • और पर्यावरण संतुलन बनाए रखा जा रहा है

भविष्य में:

  • भू-क्षरण प्रभावित क्षेत्रों में
  • सबई घास रोपण की योजना भी प्रस्तावित है
    जिससे रोजगार और पर्यावरण संरक्षण दोनों को बढ़ावा मिलेगा।

🌟 आत्मनिर्भरता की मिसाल

वनधन विकास केंद्र केड़ना की यह पहल साबित करती है कि अगर:

  • स्थानीय संसाधनों का
  • वैज्ञानिक, संगठित और बाजार-आधारित उपयोग किया जाए

तो ग्रामीण महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर बन सकती हैं, बल्कि सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन भी जी सकती हैं।

सबई घास से रस्सी निर्माण अब सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए
👉 आत्मविश्वास
👉 आर्थिक सुरक्षा
👉 और उज्ज्वल भविष्य की मजबूत डोर बन चुका है।

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