देश में होगी सेक्स एजुकेशन की शुरुआत? CJI चंद्रचूड़ की बेंच ने ऐसा क्या कहा कि होने लगी खुसर-फुसर

आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी (अश्लील सामग्री) देखना और उसे डाउनलोड करना बाल यौन अपराध संरक्षण यानी पॉक्सो कानून और सूचना प्रौद्योगिकी कानून (IT Act) के तहत अपराध है। इसके साथ ही CJI चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखना और डाउनलोड करना पॉक्सो कानून और आईटी कानून के तहत अपराध नहीं है।

इसी फैसले में बेंच ने एक अहम टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से देश भर में सेक्स एजुकेशन प्रोग्राम लागू करने का भी आह्वान किया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार स्वास्थ्य और यौन शिक्षा के लिए एक व्यापक कार्यक्रम या तंत्र तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने पर विचार करे। पीठ ने कहा कि भारत में यौन शिक्षा के बारे में गलत धारणाएं व्यापक तौर पर अपनी पैठ बनाए हुए है। यहां लोग सामाजिक कलंक की वजह से यौन स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करने से कतराते हैं, जिसके परिणामस्वरूप किशोरों के बीच यौन स्वास्थ्य को लेकर कई तरह की गलतफहमियां पैदा होती हैं और वे कई बार गलत रास्ते पर चले जाते हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि रूढ़िवादी समाज में माता-पिता और शिक्षकों समेत अधिकांश लोग सेक्स पर चर्चा करना गलत, अनैतिक या शर्मनाक महसूस करते हैं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने कहा, “एक प्रचलित गलत धारणा यह है कि सेक्स एजुकेशन युवाओं में संकीर्ण सोच और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को बढ़ावा देती है। आलोचक अक्सर यह तर्क देते हैं कि यौन स्वास्थ्य और गर्भनिरोधकों के बारे में जानकारी देने से किशोरों यौन गतिविधियों में लिप्त हो जाएंगे और यौन गतिविधियां बढ़ जाएंगी। हालांकि, शोध से पता चला है कि सेक्स एजुकेशन वास्तविकता में यौन गतिविधि की शुरुआत में देरी करता है और यौन रूप से सक्रिय लोगों के बीच सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा देता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान इस दृष्टिकोण पर भी प्रकाश डाला कि यौन शिक्षा एक पश्चिमी अवधारणा है जो पारंपरिक भारतीय मूल्यों के साथ मेल नहीं खातीं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की आम धारणा के कारण ही स्कूलों में यौन शिक्षा कार्यक्रम लागू करने में विभिन्न राज्य सरकारों ने विरोध किया है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का विरोध प्रभावी और व्यापक सेक्स एजुकेशन प्रोग्राम को लागू करने में बाधा डालता है, जिससे कई किशोर यौन स्वास्थ्य के बारे में सटीक जानकारी से वंचित रह जाते हैं।

सीजेआई की बेंच ने इस दौरान झारखंड सरकार द्वारा शुरू की गई उड़ान योजना की तारीफ की, जिसके तहत राज्य के किशोरों को किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलावों के बारे में जानकारी दी जाती है। इस योजना की शुरुआत साल 2006 में हुई थी। इस योजना को डेविड और ल्यूसिल पैकार्ड फ़ाउंडेशन और झारखंड सरकार ने साथ मिलकर लागू किया है। कोर्ट ने इसके साथ ही यह भी कहा कि यौन शिक्षा न केवल प्रजनन के जैविक पहलुओं को कवर करती है, बल्कि सहमति, स्वस्थ संबंध, लैंगिक समानता और विविधता के प्रति सम्मान सहित कई विषयों को भी शामिल करती है।

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