अमेरिका में हुए संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन के बाद यूनाइटेड नेशन्स सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भारत की स्थाई सदस्यता को लेकर बात और जोर पकड़ चुकी. वाइट हाउस समेत लगभग सभी स्थाई सदस्य चाहते हैं कि गुट में भारत भी पक्की तौर पर शामिल हो जाए. तब दिक्कत कहां है? परमानेंट सदस्यों में से एक चीन लगातार इसपर वीटो लगाता रहा. लेकिन अगर वो मान भी जाए, तब भी रास्ता में कई रोड़े हैं, जैसे यूनाइटेड फॉर कंसेंशस. यह 50 से ज्यादा देशों का वो संगठन है, जिसका काम ही विरोध है.
यूएन के कई सब-ग्रुप हैं. इसी में से एक है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, जो यूएन की सबसे पावरफुल शाखा है. इस काउंसिल में 15 सदस्यों की जगह है. UNSC की मेंबरशिप दो तरह की होती है- स्थाई और अस्थाई. पांच ही देश इसके परमानेंट सदस्य हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और चीन. इसके अलावा 10 ऐसे देश सदस्य होते हैं, जो हर दो साल में बदल जाते हैं.
भारत लंबे समय से यूएनएससी के लिए जोर लगाता रहा. यूएनएससी पर अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा पक्की करने और यूएन चार्टर में किसी भी बदलाव को मंजूरी देने की जिम्मेदारी है. ये बहुत बड़ी बात है क्योंकि सीधा असर दुनिया के हर देश पर होता है. भारत को अगर ये जगह मिले तो ग्लोबल स्तर पर उसे कई कूटनीतिक फायदे हो सकते हैं. लोग देश की बढ़ती ताकत को तो अब भी जानते हैं लेकिन फिर उसपर आधिकारिक ठप्पा लग जाएगा. साथ ही वीटो पावर आने से वो इंटरनेशनल फैसलों में सीधा दखल दे सकता है. अंदरुनी आतंकवाद, जिसमें पाकिस्तान या दूसरे पड़ोसी देशों का हाथ है, उसे डील करने के लिए देश के पास ज्यादा ताकत आ जाएगी.
कई बार अस्थाई सदस्य रह चुके भारत की स्थाई कुर्सी के लिए चारों ही स्थाई सदस्य राजी हैं, सिवाय चीन के. पांचवा मेंबर चीन डरा हुआ है कि भारत भी इस गुट में आए तो उसकी ताकत में सीधी कमी आएगी. साथ ही बाकी देशों से भारत की घनिष्ठता के चलते वो अलग-थलग पड़ सकता है. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. एक गुट ऐसा है जिसका काम ही भारत या जापान जैसे देशों को यूएनएससी में जगह मिलने से रोकना है.
यूनाइटेड फॉर कंसेंशस (यूएफसी) वैसे कोई आधिकारिक ग्रुप नहीं है लेकिन चूंकि इसमें बहुत से देश शामिल हैं, तो जाहिर है कि इनकी सीधी नाराजगी कोई नहीं लेना चाहेगा. 90 के दशक में बने यूएफसी का कहना है कि सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य पांच ही रहें. भारत, जापान, जर्मनी या दक्षिण अफ्रीका कोई भी इसमें शामिल न हो. इसकी बजाए अस्थाई सदस्यों को बढ़ा दिया जाए. फिलहाल 10 अस्थाई मेंबर हैं जो हर दो साल के लिए चुने जाते हैं, लेकिन इनके पास खास ताकत नहीं होती.
फिलहाल भारत समेत जिन चार देशों की मेंबरशिप पक्की करने की बात हो रही है, उन्हें जी4 कहते हैं. यूएफसी इन्हीं चार देशों का विरोध कर रहा है. उसका लॉजिक है कि परिषद में सदस्य बढ़ने से असंतुलन आ सकता है. सारे देश अपनी-अपनी बात करेंगे और ग्लोबल मुद्दों पर खींचतान बढ़ जाएगी. यूएफसी में शामिल देश ये भी मांग कर रहे हैं कि वीटो पावर में कुछ बदलाव हो, या उसे खत्म ही कर दिया जाए ताकि सब मिलकर फैसला ले सकें. हालांकि सुरक्षा परिषद इसपर कतई राजी नहीं क्योंकि ऐसा करने पर ये परिषद भी किसी दूसरी संस्था की तरह हो जाएगी, जिसका कोई दबदबा या डर नहीं बचेगा.
ये सीधे-सीधे नहीं कहा जा सकता लेकिन इस ग्रुप में कई देश हैं, जो भारत के धुर विरोधी रहे, या किसी न किसी तरह से घेरने की कोशिश करते रहे. जैसे पाकिस्तान, कनाडा, बांग्लादेश और तुर्की. यूएफसी के यही सदस्य सबसे ज्यादा जोर लगा रहे हैं कि स्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ने न पाए. वे बार-बार कहते रहे कि इससे कुछ देशों को ज्यादा फायदा मिलने लगेगा और ग्लोबल पॉलिटिक्स में असंतुलन आएगा.
सबसे एक्टिव देशों में इटली, पाकिस्तान, साउथ कोरिया, मैक्सिको, स्पेन, तुर्की, अर्जेंटिना, कनाडा, कोलंबिया और सिंगापुर हैं. इन्हें मिलाकर लगभग 50 देश हैं, जो यूएनएससी में सदस्य बढ़ाए जाने का जोरदार विरोध करते रहे. वे यूनाइटेड नेशन्स की बैठकों में अपनी बात रखते रहे. जब भी सुरक्षा परिषद में परमानेंट सदस्यों को बढ़ाने से जुड़ी बात आती है, यूएफसी संगठित तौर पर अपना विरोध दर्ज कराता है.
हां. चूंकि इसमें बहुत से छोटे-बड़े देश मिलकर विरोध करते आए हैं तो सुरक्षा परिषद में रिफॉर्म का मुद्दा धीमा हो गया. बता दें कि नब्बे के दशक में ही परिषद में बदलाव लाकर और सदस्यों को जोड़ने का मुद्दा उठा था, तभी जी4 को रोकने के लिए यूएफसी बन गया और तब से यह लगातार इसी काम में सारा जोर लगा रहा है.