2 बार चुनाव हारे, 1 में तीसरे नंबर पर रहे, चौथी बार CM बनने वाले हेमंत सोरेन की कहानी

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दो दशकों के राजनीतिक सफर में झारखंड के सबसे सशक्त राजनेता के तौर पर पहचान बनाई, वहीं देश में आदिवासी जनमानस के बीच वह उम्मीद की किरण की तरह उभरे। साल 2005 में पिता शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत बड़े भाई दुर्गा सोरेन के पास थी। इसी साल विधानसभा चुनाव हुए तो हेमंत सोरेन पहली बार दुमका से विधानसभा चुनाव में झामुमो प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे। लेकिन राजनीति में उनकी इंट्री राजनीतिक हार से हुई। दुमका में वह अपने पिता के सहयोगी रहे स्टीफन मरांडी से न सिर्फ चुनाव हार गए, बल्कि वह दुमका विधानसभा में तीसरे नंबर पर रहे।

साल 2009 में झामुमो ने उन्हें राज्यसभा भेजा। लेकिन 2009 के विधानसभा चुनाव में दुबारा उन्होंने विधानसभा का चुनाव दुमका सीट से लड़ा। इस बार बाजी पलटी। पहली बार विधानसभा में उनकी इंट्री हुई। राष्ट्रपति शासन के बाद सितंबर 2010 में भाजपा और झामुमो ने गठबंधन में सरकार बनाई। अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने, हेमंत सोरेन ने उपमुख्यमंत्री का पद संभाला। ढाई ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनाए जाने और स्थानीयता नीति लागू नहीं करने के आरोपों पर गठबंधन की सरकार गिर गई। इसके बाद कांग्रेस के सहयोग से झामुमो सत्ता में आई।

पहली बार 13 जुलाई 2013 को हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। डेढ़ साल वह मुख्यमंत्री रहे। लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी, हेमंत सोरेन ने तब दो सीटें बरहेट और दुमका से चुनाव लड़ा। दुमका सीट पर उन्हें भाजपा की डॉ लुईस मरांडी ने हरा दिया, जबकि बरहेट सीट पर जीत दर्ज कर वह सदन पहुंचे। पांच सालों तक वह नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहे।

राजनीति के बने अजातशत्रु

दो दशकों के राजनीतिक सफर में हेमंत सोरेन ने जहां झामुमो को अपराजेय बना दिया, वहीं झारखंड की राजनीति के आजातशत्रु बन गए। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के दौर में झामुमो आदिवासी जनमानस की पसंद थी, पार्टी संताल परगना व कोल्हान प्रमंडलों में ही चुनाव के दौरान सीटें निकाली पाती थीं। लेकिन अब झामुमो पलामू से लेकर दक्षिणी छोटानागपुर, कोल्हान से लेकर संताल व उत्तरी छोटानागपुर में दम दिखा रहा है। साल 2005 में जब शिबू सोरेन के हाथों में पूरी पार्टी की कमान थी, तब झामुमो ने 17 विधानसभा सीटें जीती थीं, वहीं राज्य में 14.3 प्रतिशत वोट उसे चुनाव में हासिल हुए थे। साल 2009 में दुर्गा सोरेन की असमय मौत के बाद हुए चुनाव में हेमंत सोरेन पार्टी के भीतर अहम भूमिका में आ गए थे।

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