वैसे तो अयोध्या जनपद में जगहों पर श्रीराम लीलाओं का मंचन रात के समय किया जा है। वहीं, दिन के समय खुले मैदान पर सजीव मंचन जाना बाजार की रामलीला में दिखता है। खुले मैदान में रामलीला का मंचन करने वाली यह सबसे पुरानी राम लीला है। प्रबंधक शैलेंद्र प्रताप यादव, अध्यक्ष राम शंकर सोनी, सुभाष तिवारी, मालिक राम वर्मा सोनू सोनी ने बताया कि क्षेत्रीय कलाकार 16 अक्टूबर से रामलीला का मंचन शुरू करेंगे।
जाना बाजार में श्रीरामलीला की शुरुआत विश्वनाथ स्वर्णकार की अगुवाई में बैजू साव, राम हेत गुप्ता, मेवा गुप्ता, राम सकल गुप्ता, केरानी स्वर्णकार सहित अन्य लोगों ने बाबा फुल्लर दास के सागर से किया था। दो वर्ष रामलीला का मंचन सड़क के किनारे किया गया। बाद में भारी भीड़ होने पर स्थान बदला गया। जाना बाजार के बाहर स्थित लोहरा की बाग में सन् 1947 से एक तरफ रावण दरबार तो दूसरी तरफ राम दरबार का मंच बनाकर रामलीला का मंचन होने लगा।
साथ ही तीन रात धार्मिक सामाजिक और एतिहासिक ड्रामे का भी आयोजन शुरू कर दिया गया। समिति के अध्यक्ष और जन्मदाता विश्वनाथ स्वर्णकार पहलवान भी थे। उस समय खपराडीह रियासत के फरवार में कुश्ती का आयोजन होता रहता था। उन्ही दिनों नागपंचमी के अवसर पर कुश्ती दंगल का आयोजन रियासत द्वारा किया गया। इसमें बनारस के पहलवान ने क्षेत्र के कई पहलवानों को पटखनी देकर चैलेंज किया था। इस मौके पर राजा अखंड प्रताप सिंह के आदेश पर मौके पर मौजूद विश्वनाथ स्वर्णकार ने चुनौती को स्वीकार कर धोबिया पाठा पटकी देकर पहलवान को चित कर क्षेत्र की लाज बचाई। खुश होकर राजा अखंड प्रताप सिंह ने विश्वनाथ स्वर्णकार को इनाम देना चाहा। विश्वनाथ स्वर्णकार ने राजा अखंड प्रताप से हो रही रामलीला के लिए उसी भूमि की मांग की। राजा अखंड प्रताप सिंह ने उस समय के पांच रुपए के स्टांप पर चार एकड़ जमीन श्री रामलीला समिति को लिखित में दान दे दिया। इसके उपरांत रामलीला के मंचन को नई पहचान के साथ अपनी खुद की जमीन मिल गई। इसी बीच रामलीला के अंगद का किरदार निभाने वाले रेलवे के अधिकारी श्रीराम मिश्रा के सहयोग से सन् 1983-84 में लखनऊ से चिट फंड कंपनी में श्रीरामलीला समिति जाना बाजार के नाम से रजिस्ट्रेशन कराया गया, जो आज तक चल रही है।
जमीन छिन गई, कलाकारों के पास कपड़े भी नहीं बचे
इसी बीच श्री रामलीला समिति की जमीन पर कई बार अतिक्रमण भी होता रहा। राजा अखंड प्रताप सिंह द्वारा दिए गए स्टांप में चार एकड़ की भूमि पर मौजूदा समय पर रामलीला समिति के पास बहुत ही कम भूमि बची है। इसके बावजूद भी थोड़ी बची जमीन पर मंचन जारी है। काफी उपेक्षा की शिकार समिति के पास मंचन के नाम पर न तो पर्दा है और ना ही नए कपड़े। बहुत पुराने कपड़े ही बचे हैं जिससे रामलीला का मंचन किसी तरह किया जा रहा है। अयोध्या मंडल में दिन के समय मैदान में खेली जाने वाली पहली श्री रामलीला का खिताब पाने वाली जाना बाजार की राम लीला आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। दो वर्ष पूर्व रामलीला मैदान के राम दरबार पर लगभग 85 फुट ऊंचे मंदिर का निर्माण मौजूदा प्रबंधक शैलेंद्र प्रताप यादव उर्फ बाबा द्वारा अपने पैसे के साथ जनता के सहयोग से कराया गया है जो चार तल में है। वही रावण दरबार पर सिर्फ मंच ही बचा है जिस पर कई वर्षों से समाज सेवी और राजनीतिक लोग आए दिन विविध कार्यक्रम करते रहते हैं।