भू-जल संरक्षण छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में जल एवं मृदा संरक्षण के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों पर प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारियों ने किया अध्ययन
रायपुर, छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में जल एवं मृदा संरक्षण के क्षेत्र में किए जा रहे कार्य अब राष्ट्रीय स्तर पर एक मॉडल बनते जा रहे हैं। हाल ही में, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून से भारतीय वन सेवा (IFS) वर्ष 2025-26 बैच के 133 प्रशिक्षु अधिकारियों का एक दल 8 से 15 मार्च तक छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर इन कार्यों का अध्यान कर रहा है।
मूल उद्देश्य:
इस अध्ययन दौरे का उद्देश्य छत्तीसगढ़ में वन विभाग द्वारा किए गए भू-जल संरक्षण और जल संवर्धन कार्यों का गहन अध्ययन करना था। इन कार्यों ने न केवल मिट्टी के कटाव को रोका है बल्कि जल स्तर को भी बढ़ाया है, जिससे राज्य में जल संकट को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
दक्षिण सिंगपुर परिक्षेत्र के पम्पार नाले का भ्रमण
9 मार्च को प्रशिक्षु अधिकारियों को दक्षिण सिंगपुर परिक्षेत्र के पम्पार नाला का भ्रमण कराया गया। यहां अधिकारियों को यह बताया गया कि किस प्रकार तकनीकी उपायों के माध्यम से मिट्टी के कटाव को रोका गया और जल स्तर को बढ़ाया गया।
- ब्रशवुड चेकडेम
- लूज बोल्डर संरचना
- गेबियन संरचना
ये सभी संरचनाएँ मिट्टी के कटाव को रोकने और जल संरक्षण में सहायक साबित हुई हैं। इसके अलावा, अब ग्रामीणों को सिंचाई के लिए पानी और वन्यजीवों को सालभर जल उपलब्ध हो रहा है।
वरिष्ठ अधिकारियों से मार्गदर्शन:
इस दौरान, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक शालिनी रैना और मुख्य वन संरक्षक मणिवासगन एस. सहित वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रशिक्षु अधिकारियों को क्षेत्रीय कार्यों की विस्तृत जानकारी दी। धमतरी वनमंडलाधिकारी श्री जाधव श्रीकृष्ण ने बताया कि पम्पार नाला क्षेत्र में किए गए कार्यों से न केवल जल स्तर बढ़ा है, बल्कि स्थानीय लोगों की जीवनशैली में भी सुधार हुआ है।
अध्यान के अगले चरण:
प्रशिक्षु अधिकारी दल का अगला चरण कुसुमपानी, कांसा, और साजापानी नालों का भ्रमण होगा। इसके साथ ही, वनधन विकास केंद्र, दुगली में वन प्रबंधन से जुड़ी नई तकनीकों पर भी जानकारी दी जाएगी।
संक्षेप में:
यह अध्ययन दौरा यह प्रमाणित करता है कि छत्तीसगढ़ में किए जा रहे जल संरक्षण और मृदा संरक्षण कार्य देशभर के लिए एक आदर्श मॉडल बन रहे हैं। इन कार्यों ने न केवल पर्यावरण के संरक्षण में मदद की है बल्कि स्थानीय समुदायों की जीवनशैली में भी सुधार किया है। अब ये प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहे हैं और आईएफएस अधिकारियों द्वारा किए गए अध्ययन से यह स्पष्ट है कि इन पहलों को देशभर में अपनाया जा सकता है।