जांजगीर-चांपा। राजनीति में “परिवारवाद” की बातें तो आपने खूब सुनी होंगी, लेकिन जिले के स्वास्थ्य विभाग ने इसे एक नई ऊंचाई दी है। यहाँ “महिला सशक्तिकरण” का एक ऐसा अनोखा मॉडल पेश किया गया है, जहाँ मैडम साहिबा कुर्सी पर बैठती हैं और साहब का “प्रमोशन” घर बैठे हो जाता है।
15 दिन में ‘अपनापन’ का चमत्कार
कहते हैं नया अधिकारी आने पर व्यवस्था बदलती है, लेकिन यहाँ तो सिर्फ ‘रिश्तेदारी’ की किस्मत बदल गई। कुर्सी संभालने के महज 15 दिनों के भीतर जिले के सबसे मलाईदार और महत्वपूर्ण प्रभार—मलेरिया नियंत्रण और दवा भंडार—की चाबियाँ किसी काबिल अजनबी को सौंपने के बजाय सीधे ‘जीवनसाथी’ के हाथों में थमा दी गईं। इसे कहते हैं प्रशासनिक सूझबूझ…
‘पंचायत पति’ की तर्ज पर ‘सीएमएचओ पति’ का उदय
अक्सर गांवों में सुना जाता था कि सरपंच तो पत्नी है लेकिन हुकूमत ‘सरपंच पति’ की चलती है। अब जिले का स्वास्थ्य विभाग भी इसी ‘ग्रामीण फॉर्मूले’ पर अपग्रेड हो गया है। सूत्रों की मानें तो फाइलों पर हस्ताक्षर मैडम के हो रहे हैं, लेकिन मर्जी और ‘पावर’ उन्हीं साहब की चल रही है, जिन पर कल तक ड्यूटी से गायब रहने के आरोप लग रहे थे।
पुराने दाग और नए इनाम
ये वही साहब हैं, जिनके खिलाफ जनता ने कभी कलेक्टर से गुहार लगाई थी कि “हुजूर, ये ओपीडी में दर्शन नहीं देते।” पर साहब की किस्मत तो देखिए, शिकायतें ठंडे बस्ते में गईं और इनाम के तौर पर अब पूरे जिले का दवा भंडार उनके हवाले कर दिया गया। शायद विभाग का मानना है कि जो एक अस्पताल नहीं संभाल सका, वह पूरे जिले का बजट और मलेरिया बखूबी संभाल लेगा!
नैतिकता गई तेल लेने, अब तो बस ‘सेवा’ है!
एक तरफ सरकार कहती है कि पारदर्शिता लाओ, दूसरी तरफ यहाँ ‘पारिवारिक प्रेम’ की ऐसी गंगा बह रही है कि नैतिकता किनारे पर बैठकर आंसू बहा रही है। क्या कलेक्टर साहब को इन ‘संबंधों’ की जानकारी दी गई? या फिर यह मान लिया गया कि जिले का स्वास्थ्य सुधारने के लिए पति-पत्नी का एक ही ऑफिस में बैठना जरूरी है?
फिलहाल, विभाग में सन्नाटा है और चर्चा गर्म है। जनता समझ नहीं पा रही कि यह स्वास्थ्य विभाग का दफ्तर है या किसी का “ड्राइंग रूम”, जहाँ सारे बड़े फैसले चाय की चुस्कियों के साथ ‘आपसी सहमति’ से लिए जा रहे हैं।