क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट? कोलकाता कांड में सच सामने लाने के लिए सीबीआई का बड़ा दांव

कोलकाता के अस्पताल में महिला डॉक्टर से रेप और हत्या के मामले में स्पेशल कोर्ट ने सीबीआई को आरोपी संजय रॉय का पॉलीग्राफ टेस्ट करने की इजाजत दे दी है। आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर का शव सेमीनार हॉल में पाया गया था। इसके बाद मुख्य आरोपी संजय रॉय को गिरफ्तार कर लिया गया और इस केस की जांच सीबीआई कर रही है। गुरुवार को इसी अदालत ने अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और अन्य पांच लोगों पर भी टेस्ट करने की मंजूरी दी थी।

पॉलीग्राफ एक डिवाइस होती है जिसके जरिए पता लगाया जाता है कि आरोपी जो बात कह रहा है वह झूठ है या सही। यह मशीन इसीजी की तरह ही होती है। इसके जरिए सवाल और जवाब के दौरान आरोपी क शरीर में होने वाले बदलावों का अध्ययन करके एक निष्कर्ष निकाला जाता है। दरअसल कोई जब झूठ बोलता है तो उसके दिल की धड़कन, सांस लेने और अन्य गतिविधियों में बदलाव होता है। इसमें बीपी और नाड़ी को भी मापा जाता है।

इटली के अपराध विज्ञानी सेसारे लोम्ब्रासो ने इसका सबसे पहले इस्तेमाल किया था। उन्होंने अपराध के बारे में पता लगाने के लिए बीपी में परिवर्तन का अध्ययन किया था। इसके बाद अमेरिकी मनोवैज्ञानिक विलियम मैरस्ट्रॉन ने 1914 ने अलग मशीन तैयार की। हालांकि नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट दोनों ही चिकित्सा के क्षेत्र में विवादित रहे हैं। इसमें सच और झूठ की 100 पर्सेंट गारंटी आज भी नहीं है। हालांकि कई बार पॉलीग्राफ टेस्ट कारगर भी साबित होता है।

भारत में प्रेस्टो इन्फोसॉलूशन्स नाम की कंपनी पॉलीग्राफ मशीनों की टॉप प्रवोइडर है। सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में भी इन मशीनों का इस्तेमाल होता है। जांच एजेंसियां इन मशीनों को खऱीदती हैं। हालांकि वैध कारण बताकर प्राइवेट संस्थाएं भी इसे खरीद सकती हैं। मशीन खरीदने के कुछ कानूनी नियम है। इसके इसके लिए सरकार की अनुमति जरूरी होती है।

संविधान के आर्टिकल 20 (3) के तहत नागरिकों को खुद का बचाव करने का अधिकार है। ऐसे में आरोपी को भी इस टेस्ट को रिजेक्ट करने का अधिकार है। किसी आरोपी पर जबरन यह टेस्ट नहीं किया जा सकता है। अगर किसी पर टेस्ट के लिए दबाव डाला जाता है तो यह आर्टिकल 20 (3) का उल्लंघन होगा। कई ऐसी परिस्थितियां भी होती हैं जब पॉलीग्राफ टेस्ट किसी आरोपी पर ठीक से काम नहीं करता है।

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