खाकी नहीं बल्कि सफेद वर्दी क्यों पहनती है देश में सबसे पहले बनी कोलकाता पुलिस

कोलकाता पुलिस इन दिनों चर्चा में है. खासकर कोलकाता में एक महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप और मर्डर मामले के बाद. कोलकाता पुलिस ने इस मामले को जिस तरह टेकल किया, उस पर ना केवल सवाल उठ रहे हैं बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कोलकाता पुलिस का लताड़ा है. हालांकि इसके कुछ दिनों पहले ही राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता पुलिस की पीठ ठोंकते हुए इसे बेस्ट पुलिस बताया था. वैसे कोलकाता पुलिस कई मामलों में देश की अन्य पुलिस से अलग तो है. देश में सबसे पहले पुलिसिंग प्रणाली की शुरुआत कलकत्ता में इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए की गई.

कोलकाता में ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रमुख अधिकारी जॉब चार्नॉक ने 1690 में हुगली नदी के तट पर सुतानुती गांव में अपनी नाव “मद्दापोलम” का लंगर डाला था. तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय जमींदार सबर्ना रॉय चौधरी से सुतानुति, कालिकाता और गोबिंदपुर गांव खरीदे, यहां उसने पुलिस व्यवस्था की शुरुआत की, जिसे शुरुआती कोलकाता की पुलिस कहा जा सकता है. फिर सिविल और क्रिमिनल प्रशासन चलाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1720 में ही बाकायदा एक अफसर की नियुक्ति की.

1856 में गवर्नर-जनरल ने एस वाउचोप को, जो उस समय कलकत्ता के मुख्य मजिस्ट्रेट थे, पहले पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त किया। इसने भारत में पुलिस व्यवस्था की कमिश्नरी प्रणाली की शुरुआत को चिह्नित किया, जिसकी शुरुआत कलकत्ता में हुई थी. कलकत्ता पुलिस अधिनियम और कलकत्ता उपनगरीय पुलिस अधिनियम, जो आज भी लागू हैं, 1866 में कमिश्नर वी.एच. शाल्च के कार्यकाल के दौरान बनाए गए थे.

पहली बार जब कोलकाता में पुलिस कमिश्नर बनाए गए तो इसके अधीन तीन नायब दीवान हुआ करते थे, इन्हीं के जिम्मे पुलिस का सारा काम था. इस पूरी व्यवस्था को थानों में बांटा गया था और इन थानों का जिम्मा थानेदारों को दिया गया था.

1868 में, कलकत्ता पुलिस ने अधीक्षक ए. युनान और इंस्पेक्टर आर. लैम्ब के नेतृत्व में भारत में पहला जासूसी विभाग स्थापित किया. यह एमहर्स्ट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के पास एक एंग्लो-इंडियन महिला की भीषण हत्या के बाद हुआ, जिससे शहर की पुलिस व्यवस्था पर आक्रोश और आलोचना हुई. जासूसी विभाग स्कॉटलैंड यार्ड की तुलना में कोलकाता पुलिस की सबसे प्रसिद्ध इकाइयों में से एक बन गया

कोलकाता पुलिस के ज्यादातर नियम आदि 19वीं सताब्दी में ही बने. इसी के चलते कलकत्ता पुलिस का ड्रेस कोड भी तभी तय हुआ. कोलकाता पुलिस शुरू से ही सफेद वर्दी पहनती थी. जो अब भी जारी है.  उस समय पुलिस की वर्दी के लिए सफेद को एक सुखद और व्यावहारिक रंग माना जाता था.

कोलकाता एक तटीय स्थान है जहां साल भर उच्च गर्मी और आर्द्रता रहती है. सफेद रंग गर्मी अवशोषण को कम करने में मदद करता है. सूर्य के प्रकाश को रिफलेक्ट भी करता है, जिससे अधिकारियों को गर्म जलवायु में ठंडा रखा जाता है, यह वैसा ही है जैसे भारतीय नौसेना भी सफेद वर्दी पहनती है. कोलकाता पुलिस की सफेद वर्दी की उत्पत्ति ब्रिटिश शासन के तहत शहर की जलवायु के लिए एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में हुई थी

1947 में भारत की आजादी के बाद भी कोलकाता पुलिस ने पारंपरिक सफेद वर्दी बरकरार रखी. पश्चिम बंगाल राज्य पुलिस ने खाकी वर्दी अपनाई, लेकिन कोलकाता मेट्रोपॉलिटन पुलिस और बंगाल में कुछ अन्य क्षेत्रीय बलों ने सफेद वर्दी पहनना जारी रखा.

सफेद वर्दी का एक मौजूदा औचित्य यह है कि यह कोलकाता पुलिस अधिकारियों को राज्य पुलिस बल से अलग करने में मदद करती है. सफेद वर्दी से यह पहचानना आसान हो जाता है कि कौन सी पुलिस कोलकाता-हावड़ा कमिश्नरेट बनाम पश्चिम बंगाल राज्य पुलिस की है.

कोलकाता पुलिस के हिस्से बस कोलकाता महानगर की देख-रेख का जिम्मा है. वह केवल यही काम करती है जबकि कोलकाता के अगल बगल बन गए सब सिटी का जिम्मा राज्य की पुलिस उठाती है.

तो ये वजह है कि कोलकाता की पुलिस की वर्दी का रंग 150 सालों से कहीं ज्यादा समय से सफेद बना हुआ है. हालांकि आजादी के बाद देश की अन्य सभी पुलिस की यूनिफॉर्म खाकी हो चुकी है.

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