क्या नसरल्लाह की मौत के साथ खत्म होगा Israel का एक बड़ा दुश्मन, या पूरे मिडिल ईस्ट में फैल जाएगी जंग की आग?

इजरायल इन दिनों एक साथ कई मोर्चों पर जंग कर रहा है. हमास के साथ युद्ध को उसे एक साल बीतने को आए. इस बीच ही वो हिजबुल्लाह से भी लड़ रहा है. लेबनान से संचालित हो रहा ये आतंकी गुट लगभग चार दशक से इजरायल की नाक में दम किए हुए था. अब इसके टॉप लीडर हसन नसरल्लाह की हवाई हमले में मौत की पुष्टि हो चुकी. तो क्या इसके मायने ये हैं कि इजरायल का एक बड़ा दुश्मन खत्म हो चुका? क्या अब वो लेबनान की तरफ से निश्चिंत हो सकता है? 

हिजबुल्लाह की नींव ईरान ने इजरायल को पछाड़ने के लिए अस्सी के दशक में रखी थी. यह शिया संगठन है, जो लेबनान में बेहद ताकतवर है. इसे दुनिया के सबसे ताकतवर गैर-सरकारी सैन्य ताकत की तरह भी देखा जाता रहा, जिसका काम इजरायल और उसके सहयोगियों को परेशान करना है. यह शिया विचारधारा को फैलाने के मकसद के साथ सुन्नियों की नाक में भी दम किए रखता है. चूंकि इसकी फंडिंग ईरान करता है तो कह सकते हैं कि इसका काम मिडिल ईस्ट में इस देश को सबसे शक्तिशाली बनाए रखना भी रहा.

चरमपंथी गुट का हमास से वही संबंध है, जो दुश्मन के दुश्मनों का आपस में होता है. वे आपस में दोस्त बन जाते हैं. लेबनान में गृह युद्ध के दौरान बने इस गुट का सीधा-साफ मकसद था कि वो इस्लामिक, खासकर शिया मत को फैलाए, और इजरायल को कमजोर करते हुए फिलिस्तीन की आधिकारिक नींव रखे. यही वजह है कि जब-जब इजरायल हमास पर हमलावर हुआ, इस संगठन को गुस्सा आया. पिछले साल 7 अक्टूबर को शुरू लड़ाई के बाद से हिजबुल्लाह ने कई बार इजरायल पर हमले किए. ये बात अलग है कि इजरायली डिफेंस फोर्स उनपर हमेशा भारी रही. 

हिजबुल्लाह का मतलब अरेबिक में पार्टी ऑफ गॉड है. लेबनानी गृह युद्ध के दौरान बने संगठन का काम देश के दक्षिणी हिस्से में फैली इजरायली सेना को हटाना था. बता दें कि सिविल वॉर के दौरान पड़ोसी देशों समेत तेल अवीव भी युद्ध का हिस्सा हो गया था, और इसी दौरान उसने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया. हिजबुल्लाह से इजरायली दुश्मनी की नींव तब और मजबूत हुई. 

ये केवल लड़ाका संगठन नहीं, बल्कि राजनीति में भी शामिल है. इसकी पॉलिटिकल ताकत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि लेबनानी संसद के अध्यक्ष नबीह बेरी ने साफ कह दिया था कि जब तक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को हिजबुल्लाह से ग्रीन सिग्नल नहीं मिलेगा, तब तक राष्ट्रपति चुनाव ही नहीं होगा. 

हसन नसरल्लाह साल 1992 में हिजबुल्लाह का चीफ बना. वो केवल लेबनान ही नहीं, बल्कि लगभग पूरे मिडिल ईस्ट में काफी लोकप्रिय था. माना जाता है कि नसरल्लाह ने मध्यपूर्व को इजरायल के खिलाफ इकट्ठा करने में अहम भूमिका निभाई. उसने लड़ाकों की भर्ती, ट्रेनिंग और हथियारों पर जमकर मेहनत की. यहां तक कि साल 2000 में इसी गुट की वजह से इजरायल को दक्षिणी लेबनान खाली करना पड़ा था. इसके बाद से यही इलाका मिलिशिया का गढ़ बन गया. वो आए-दिन इजरायली सीमा पर कोई न कोई उत्पात मचाते रहता. यही वजह है कि जल्द ही नसरल्लाह इजरायल का जानी दुश्मन हो गया.  

अब उसकी मौत न केवल हिजबुल्लाह, बल्कि लेबनान और ईरान के लिए भी बड़ा झटका है. इसकी वजह से उनका गोल पोस्ट या यूं कहें कि मंजिल काफी दूर सरक चुकी. हालांकि लेबनान से लगातार आक्रामक बयान आ रहे हैं कि वे अपने लीडर की मौत का बदला लेंगे. हालांकि इसके पहले उन्हें ऐसी लीडर चुनना होगा, जो नसरल्लाह की जगह ले सके. हाशिम सफीद्दीन आधिकारिक तौर पर चुने जा चुके लेकिन उनमें आक्रामकता नसरल्लाह से कम मानी जाती रही. अब हिजबुल्लाह के लिए ये आजमाइश का समय होगा. 

फिलहाल जो हालात हैं, उसमें ऐसा लग रहा है. पिछले सालभर से इस पूरे क्षेत्र का तापमान कम होने को नहीं आ रहा. एक के बाद एक देश या उनके समर्थन वाले गुट इजरायल से जंग में जुड़ते चले जा रहे हैं. ऐसे में अगर ईरान हिजबुल्लाह नेता की हत्या के लिए तेल अवीव पर आक्रामक हो तो हो सकता है कि इजरायल के पक्ष में अमेरिका आ जुटे. अगर ऐस हुआ तो आग मध्यपूर्व अकेले को नहीं जलाएगी, बल्कि फैलती हुई काफी आगे तक जा सकती है. ईरान और लेबनान समेत बाकी देश भी ये बात समझते हैं इसलिए कमांडर की मौत के तीन दिन बाद भी मामला बातचीत तक ही सिमटा हुआ है. 

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