क्या कर्नाटक के ‘केजरीवाल’ साबित होंगे सिद्धारमैया? इस्तीफे की राजनीति उफान पर

कर्नाटक में  मैसूर अरबन डिवेलपमेंट अथॉरिटी के केस (MUDA scam case) में राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कर्नाटक हाईकोर्ट से गंभीर झटका लगा है.अदालत ने उनपर मुकदमा चलाने को मंजूरी दे दी है. कर्नाटक ठीक उसी राह पर चल रहा है जिस राह के मुसाफिर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रहे हैं. जाहिर है कि दिल्ली की तर्ज पर सिद्धारमैया से भी इस्तीफे की मांग शुरू हो गई है. अब देखना यह है कि सिद्धारमैया अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री येदियुरुप्पा की राह पर चलते हुए रिजाइन करते हैं या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राह चलते हैं. अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजनीति में दो ट्रेंड सेट कर दिए हैं. एक गिरफ्तारी के बाद भी सीएम पद पर बने रहा जा सकता है. दूसरे सीएम पद छोड़ने के बाद भी खड़ाऊं रखकर राज्य की गद्दी पर अपना नियंत्रण बनाया रखा जा सकता है.

अब जब मुकदमा चलाने की इजाजत जब कोर्ट से मिल गई है तो सवाल उठता है कि क्या सिद्धारमैया इस्तीफा देंगे या फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ही तरह अपने पद पर बने रहेंगे. दूसरा सवाल यह भी है कि अगर मुकदमा दर्ज होता है तो जांच कौन सी एजेंसी करेंगी. राज्य सरकार की एजेंसियां या फिर सीबीआई, ऐसे और भी कई सवाल है.

कोर्ट की जांच के आदेश के बाद कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया की जो प्रतिक्रिया सामने आई हैं. वो काफी कुछ अरविंद केजरीवाल जैसी ही हैं. सिद्धारमैया ने बीजेपी और जेडीएस पर निशाना साधते हुए कहा कि ये सियासी लड़ाई है. प्रदेश की जनता मेरे साथ है. मुझे विश्वास है अगले कुछ दिनों में सच्चाई सामने आएगी और जांच रद्द हो जाएगी काफी कुछ इसी तरह की बातें दिल्ली के सीएम पद से रिजाइन करने की मांग पर अरविंद केजरीवाल भी बोलते रहे हैं.

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी ठीक अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र को ही मुख्य टार्गेट पर रख रहे हैं. रमैया कहते हैं कि ‘यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार की बदले की राजनीति के खिलाफ लड़ाई है. बीजेपी और जेडीएस की इस बदले की राजनीति के खिलाफ हमारा न्यायिक संघर्ष जारी रहेगा. मुझे न्यायालय पर भरोसा है. हमारी पार्टी के सभी विधायक, नेता और कार्यकर्ता और कांग्रेस आलाकमान मेरे पक्ष में मजबूती से खड़े रहे और मुझे कानून के लिए लड़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया. बीजेपी और जेडीएस ने मेरे खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध का सहारा लिया है क्योंकि मैं गरीबों का समर्थक हूं और सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहा हूं.’ बीजेपी नेतृत्व वाली मोदी सरकार पूरे देश में विपक्ष की सरकारों को गिराना चाहती है.

2011 में कर्नाटक में बीजेपी सरकार थी.कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे बीएस येदियुरप्पा. अवैध खनन घोटाले में घिरे येदियुरप्पा पर कर्नाटक के दो वकीलों ने कथित भूमि घोटाला का आरोप लगाया. उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी. राज्यपाल थे कांग्रेस के हंसराज भारद्वाज. भारद्वाज ने भी तुरंत ही केस चलाने और जांच करने की परमिशन दे दी. हालांकि,तब तक अरविंद केजरीवाल का फॉर्मूला अभी मार्केट में नहीं आया था. राज्यपाल से परमिशन मिलने के बाद लोकायुक्त ने येदियुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. लोकायुक्त की तरफ से पहले येदियुरप्पा के खिलाफ वारंट निकाला गया और फिर उनकी जमानत खारिज कर दी गई.

जेल जाने की नौबत आने के पहले येदियुरप्पा ने बीजेपी हाईकमान के कहने पर सीएम के पद त्यागपत्र दे दिया. करीब एक महीने तक जेल में रहे.पर सिद्धारमैया अब ऐसा शायद ही करें.

सिद्धारमैया न्यायालय के आदेश के कानूनी धाराओं की व्याख्या अपने हिसाब से कर रहे हैं. उनका कहना है कि धारा 218 के तहत राज्यपाल द्वारा जारी आदेश को सिरे से खारिज कर दिया. न्यायाधीशों ने खुद को राज्यपाल के आदेश की धारा 17ए तक ही सीमित रखा. मैं विशेषज्ञों से परामर्श करूंगा कि क्या कानून के तहत ऐसी जांच की अनुमति है या नहीं. जाहिर है कि उन्हें नैतिक रूप से इस्तीफा नहीं देना है.

हालांकि भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक इकाई ने सिद्धारमैया के इस्तीफे की मांग की है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कहा कि उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि राज्यपाल की मंजूरी कानून के मुताबिक है.

सिद्धारमैया कर्नाटक में अरविंद केजरीवाल की राह पकड़ेंगे तो तय है कि केंद्र की एजेंसियां भी अपना काम शुरू करेंगी.आर्थिक मामला भी शामिल है तो जाहिर है कि ईडी भी एक्टिव होगी.घोटाले का मामला है इसलिए जाहिर है कि सीबीआई भी जांच के लिए आगे ही आएगी. तू डाल-डाल , मैं पात-पात की तर्ज पर राज्यपाल भी अपना काम दिल्ली के एलजी की तर्ज पर कर सकते हैं.

सिद्धारमैया के वकील भी अरविंद केजरीवाल के ही वकील अभिषेक मनु सिंघवी हैं. जाहिर है कि अरविंद केजरीवाल जैसे तर्क भी सिद्धारमैया के  के भी दिए जाएंगे. 

पर एक बात ऐसी है जिसमें अरविंद केजरीवाल जैसी हिम्मत कर्नाटक के मुख्यमंत्री नहीं दिखा पाएंगे. दरअसल अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार के ही नहीं अपनी पार्टी के भी मुखिया हैं. इसलिए उनकी पार्टी उनके पीछे दीवार बनकर खड़ी थी. पर यहां मामला अलग है. पार्टी के अंदर पहले से ही सीएम की कुर्सी की लड़ाई चल रही है.2023 में जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी तब सिद्धारमैया के साथ-साथ डीके शिवकुमार भी सीएम पद के दावेदार थे, लेकिन उन्हें डिप्टी सीएम की कुर्सी दी गई. ऐसे में अब जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां कर्नाटक में बनती दिख रही है, उससे शिवकुमार की दावेदारी फिर से सामने आ सकती है.

दूसरी बात यह भी है कि सिद्धारमैया की अगर गिरफ्तारी होती है तो उनके लिए सीएम की कुर्सी बचाए रखना इसलिए भी मुश्किल हो सकता है क्योंकि कांग्रेस उन्हें अरविंद केजरीवाल की तरह से अनैतिक रूप से सत्ता में बने नहीं रहने देगी.

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