यूपी के झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के नवजात शिशु गहन देखभाल यूनिट (NICU) में अचानक लगी आग में 10 नवजात बच्चों की जलकर मौत हो गई जबकि 16 अन्य घायल हो गए। सीएम योगी आदित्यनाथ ने हादसे के कारणों की जांच के आदेश दिए हैं। इस बीच प्रत्यक्ष्दर्शियों के हवाले से कई बातें सामने आई हैं। इनमें से एक यह कि हादसे के वक्त सेफ्टी अलार्म नहीं बजा। कहा जा रहा है कि सेफ्टी अलार्म समय पर बजता तो बचाव कार्य जल्द शुरू किया जा सकता था और बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।
देर रात तक मेडिकल कॉलेज में कोई यह बताने वाला भी नहीं था कि वार्ड में कुल कितने बच्चे भर्ती थे। बाद में अपुष्ट सूत्रों से पता चला कि वार्ड में 47 बच्चे भर्ती थे। पुलिस उन्हीं बच्चों का हवाला दे पा रही थी, जो रेस्क्यू कर लिए गए या जिनकी मौत की सूचना मिल गई थी। आग की सूचना के साथ ही मौके पर पहुंचे डीएम अविनाश कुमार, एसएसपी सुधा सिंह रेस्क्यू ऑपरेशन और घायल बच्चों के इलाज का जायजा ले रहे थे। तीन दिन के एक शिशु के तीमारदार महोबा के राजेश चौरसिया ने बताया कि आग लगने के बाद भगदड़ की स्थिति हो गई। करीब एक घंटे तक कोई पुरसाहाल नहीं था। भीषण धुएं से आसपास खड़े होना भी मुश्किल था। फायर पुलिस के पहुंचने के पहले कुछ लोगों ने वार्ड के खिड़की दरवाजे तोड़ने शुरू किए। कुछ बच्चे निकाले गए। तीमारदारों के मुताबिक करीब साढ़े दस बजे शिशु वार्ड के दक्षिणी कोने से धुआं उठना शुरू हुआ। जब तक स्टाफ और तीमारदार कुछ समझते लपटों ने विकराल रूप ले लिया। दरवाजे-खिड़कियां, परदे, चिकित्सा उपकरण और दवाएं जलने लगीं। कबरई, बांदा से भतीजे के नवजात बच्चे को देखने पहुंचीं संजना ने कहा कि बच्चे की मां की हालत गंभीर थी। उसे अलग रखा गया है। हम कल यहां आए तो बच्चा नहीं देखने दिया गया। आज रात जब आग लगी, भगदड़ मच गई। डॉक्टर और स्टाफ के लोग बच्चों को जिंदा जलते देखकर निकल भागे। मेरे भाई कुलदीप का बच्चा कहां है, वह बचा या जिंदा जल गया, कुछ नहीं पता। यहां कोई कुछ बताने को तैयार नहीं है। कुछ तीमारदारों ने यह आरोप भी लगाया कि आग लगते ही डॉक्टर और स्टाफ पिछले दरवाजे से भाग निकले। अगर वे एक-दो बच्चों को गोद में लेकर भागते तो तमाम बच्चों को बचाया जा सकता था।
हम अपना बच्चा नहीं उठा पाए
वार्ड से करीब सौ मीटर दूर रोक दिए तमाम तीमारदार और बच्चों के माता-पिता बिलख रहे हैं। इनमें से एक सरिता ने बताया कि वह अपनी बहन के बच्चे को देखने आई थीं। डॉक्टरों ने बच्चे की मां को दवा लेने भेजा था। मैं भी उसके साथ चली गई। लौटी तो देखा कि वार्ड से धुआं निकल रहा है। हाहाकार मचा है। हमने अंदर जाने की कोशिश की लेकिन रोक दिया गया। यहां सब कह रहे हैं कि बच्चे को बचा कर दूसरी जगह ले गए हैं लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि बच्चा कहां है। टाकोरी निवासी हरिओम का परिवार विलाप कर रहा है। हरिओम का तीन दिन का बेटा वार्ड में भर्ती था। उन्हें बताया गया है कि बच्चे की झुलस कर मौत हो गई है। इसी तरह करगुवां गांव के निवासी सतीश चंद्र का पांच दिन का बेटा मिंटू भी पीलिया की वजह से भर्ती था। उसके बारे में भी मौत की सूचना दी गई है। परिवार बेहाल है लेकिन अभी तक मेडिकल कॉलेज ने उनके बच्चे के बचने या मृत्यु की तस्दीक नहीं की है। तीमारदारों की भीड़ में खड़े रघुवर दयाल ने कहा कि मौतें दस से ज्यादा हुई हैं, जिन्हें मेडिकल कॉलेज प्रशासन छुपा रहा है। वार्ड में मशीन से गिरकर ही कई बच्चे मर गये। जो बच्चे जल कर मरे, वे इनसे अलग हैं।
दमकल पहुंचने से पहले जल गए थे 10 बच्चे
झांसी मेडिकल कॉलेज में जब तक दमकल पहुंचतीं तब तक दस बच्चे जिंदा जल गए थे। दरवाजे-खिड़की तोड़ कर 37 बच्चों को किसी तरह बाहर निकाल लिया गया था। उनका इलाज किया जा रहा था। सूत्रों का कहना है कि झुलसने और धुआं भरने वजह से उनमें से कुछ की हालत बेहद नाजुक थी। हादसे के बाद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य समेत अन्य डॉक्टरों से बात नहीं हो पा रही थी। ज्यादातर के फोन बंद थे।
आग की वजह की जांच, तरह-तरह की चर्चाएं
सीएम योगी के आदेश पर अलग-अलग टीमें आग की वजहों की जांच में जुट गई हैं। आग कैसे लगी, साफ नहीं वार्ड में आग कैसे लगी, अभी साफ नहीं है। फायर अफसर के मुताबिक बिजली की ओवर लोडिंग से आग लगने की सबसे ज्यादा संभावना मानी जा रही है। कुछ लोग वार्ड में सिलेंडर फटने की बात भी कह रहे हैं।