क्या आप ने कभी दूसरों के घर का अंधेरा दूर किया है, कभी दूसरों की मदद कर उनके जीवन में दिवाली जैसी खुशियां देने का जरिया बने हैं। ऐसा करने पर जो आनंद मिलता है, उसका सुख कुछ और ही है। ये कहना है बिजनौर के रामपुर बकली निवासी प्रीतम सिंह का। प्रीतम दूसरों के जीवन का अंधेरा दूर करने के लिए किसी पर्व या मौके का इंतजार नहीं करते, बल्कि हमेशा तैयार रहते हैं। बदलते परिवेश और कमरतोड़ महंगाई में जहां किसी के लिए अपने बच्चे पालना मुश्किल है, वहीं प्रीतम ने समाज के ठुकराए सात बच्चों का जीवन रोशनी से भर दिया जिनमें छह लड़कियां हैं। ये बच्चे उन्हें कूड़े और खेत के बीच में मिले थे। महज 11 हजार रुपए कमाने वाले प्रीतम ने इनमें दो बेटियों की शादी भी करवा दी है।
प्रीतम सिंह ने इन सभी बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया। ऐसे बच्चों को पालना और उन्हें पैरों पर खड़ा होने लायक बनाना ही प्रीतम का उद्देश्य है। समाज के लिए मिसाल बने प्रीतम का कहना है कि अगर उन्हें कोई और बच्चा भी मिलता है तो वह उसका पालन-पोषण करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस नेक काम में उनकी पत्नी सतीशो का भी बड़ा योगदान है।
प्रीतम सिंह ने सात बच्चों को दिया पिता का नाम, उनमें छह बेटियां
प्रीतम सिंह का खुद का कोई बच्चा नहीं है। उन्होंने जन्म देने के बाद छोड़ दिए गए सात बच्चों को अपनाया और उन्हें पिता का नाम देकर उनका पालन-पोषण किया है। दूसरों की कोख से जन्मे इन बच्चों को प्रीतम की पत्नी सतीशो ने मां की कमी नहीं खलने दी। प्रीतम सिंह ने अंजलि, महिमा, काजल, आशा, गुंजन, दिव्या और आनंद को पाला है। 12वीं पास करने के बाद उन्होंने अंजलि और महिमा की शादी करवाकर उनका घर बसवा दिया है। अब बीए पास कर चुकी काजल की शादी की कोशिश कर रहे हैं। एक बेटा आनंद है जो 12वीं कर चुका है। सबसे छोटी गुंजन अभी नर्सरी में है। दिव्या भी अभी छोटी है।
प्रीतम सिंह को कोई बच्ची खेत में तो कोई कूड़े के ढेर में मिली
प्रीतम ने बताया कि उन्हें तीन बच्चे तो रिश्तेदारों के मिले और अन्य बच्चे ईख के खेत, तालाब, कूड़े के ढेर में मिले थे। प्रीतम बताते हैं कि पत्नी सतीशो पूरा सहयोग करती है। प्रीतम ने सभी बच्चों को बाप का प्यार दिया है। प्रीतम का कहना है कि जिंदगी के किसी मोड़ पर वो बेटियों का साथ नहीं छोडे़गे। प्रीतम बताते है कि उनके पास जमीन नहीं है, लेकिन ईश्वर की कृपा से ऐसे बच्चों को गोद लेना और उनकी जिंदगी संवारना उनके जीवन का मकसद बना गया है।
प्रीतम सिंह की आर्थिक स्थिति खराब फिर भी पालन-पोषण में कमी नहीं
प्रीतम सिंह की आार्थिक स्थिति मजबूत नहीं है। पहले तो वो 65 गज के कच्चे मकान में ही रहते थे। एक कमरा था वो भी कच्चा। लोगों ने मदद कर रहने लायक घर बनवा दिया। प्रीतम पहले रिक्शा चलाते थे। बाद में एक मिल में काम करने लगे। अभी वह पीआरडी जवान हैं और करीब साढ़े 11 हजार रुपये महीना कमाते हैं। प्रीतम कहते हैं कि सात नहीं, दस बच्चों की भी मरते दम तक सेवा करेंगे। आज भी समाज के ठुकराए बच्चे की खबर मिलती है तो प्रीतम बच्चा लेने पहुंच जाते हैं।