AAP के मौजूदा विधायकों की ‘कुर्बानी’ देकर केजरीवाल क्या दे पाएंगे वापसी की गारंटी? |

अरविंद केजरीवाल दिल्ली में पदयात्रा कर रहे हैं. दूसरे चरण की पदयात्रा दिसंबर के आखिर तक चलेगी. बीच बीच में वो आम आदमी पार्टी के मंडल प्रभारियों से भी मिल रहे हैं. मंडल प्रभारियों को क्या करना है और क्या नहीं करना है, ये सब भी मौके पर ही बता और समझा देते हैं – और लगे हाथ आगाह भी कर देते हैं कि सभी मौजूदा विधायकों को टिकट मिलेगा, ये कोई मानकर न चले. मतलब, बहुतों के टिकट कटने जा रहे हैं. 

आम आदमी पार्टी टिकट पाने के लिए मौजूदा विधायकों को भी इम्तिहान पास करना होगा, और ये इम्तिहान कुछ और नहीं बल्कि एक खास तरह का सर्वे होगा. सर्वे लिस्ट में जो अपने इलाके का टॉपर होगा, टिकट भी उसी को मिलेगा. 

फिर तो जब तक टिकट फाइनल नहीं हो जाता, मौजूदा विधायक भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा. क्या पता अब आम आदमी पार्टी भी अपनों का टिकट काट कर बाहर से आये नेताओं को उम्मीदवार बना डाले – और जब यही सब होगा तो क्या जीत और सत्ता में वापसी भी पक्की हो पाएगी?

मौजूदा विधायकों का क्या कसूर?

किराड़ी और तिलक नगर में कार्यकर्ताओं से अरविंद केजरीवाल ने जो बात कही थी, बार बार दोहरा रहे हैं. समझाइश है कि किसी को भी टिकट नहीं मिलने वाला है, हर सीट पर सोच समझ कर ही टिकट दिया जाएगा. बताते हैं कि आम आदमी पार्टी सभी 70 सीटों पर मौजूदा विधायकों के साथ साथ अन्य संभावित उम्मीदवारों के नाम पर गंभीरता से विचार कर रही है. 

आम आदमी पार्टी नेता प्रियंका कक्कड़ के बयानों को समझें तो सर्वे विधायकों के चयन का आधार तो होगा ही, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने का जरिया भी होगा. सर्वे के जरिये दिल्ली के लोग खुलकर राय दे सकेंगे कि उनके इलाके के विधायक ने कितना काम किया है? और हा, जो काम हुए हैं या नहीं हुए हैं, उसे लेकर लोगों की राय क्या है?

पार्टी के अंदर कांग्रेस छोड़ कर आये मतीन अहमद और बीजेपी से आने वाले प्रमोद सिंह तंवर जैसे नेताओं को लेकर भी चर्चा हो रही है. अब अगर बाहर से आने वाले ऐसे नेताओं को टिकट दिया जाता है, तो मौजूदा विधायकों का टिकट काटना ही पड़ेगा, सिवा उन विधानसभा क्षेत्रों के जहां हार का मुंह देखना पड़ा था. 

ऐसा करने वाली आम आदमी पार्टी कोई अलग नहीं है, हर राजनीतिक दल में ये होता रहा है, लेकिन अक्सर उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है – और ऐसा होता है तो विधायकों का ही कसूर क्यों समझा जाये?

सत्ता विरोधी लहर किसके खिलाफ है

निश्चित तौर पर अरविंद केजरीवाल को लग रहा होगा कि दिल्ली चुनाव में सत्ता विरोधी लहर भी हावी हो सकती है, लेकिन क्या उसके लिए सिर्फ मौजूदा विधायक ही जिम्मेदार होंगे. कुछ विधायक हो सकते हैं, लेकिन जिस तरह से बड़ी संख्या में टिकाट काटे जाने की बात हो रही है, वैसा तो नहीं लगता. 

लेकिन, सवाल ये भी है कि सत्ता विरोधी लहर क्या विधायकों के ही खिलाफ हो सकती है, दिल्ली सरकार के मंत्रियों और खुद अरविंद केजरीवाल के खिलाफ नहीां हो सकती? ये भी सुनने में आया है कि अगर दोबारा टिकट दिया जाता है, तो वे सिर्फ मंत्री ही होंगे, बाकियों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. 

दिल्ली शराब घोटाले के आरोपों का कितना असर?

दिल्ली शराब घोटाला वो मामला है जिसके चलते अरविंद केजरीवाल को भी जेल जाना पड़ा. फिलहाल अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह उसी मामले में जमानत पर बाहर हैं. 

अगर ये दिल्ली चुनाव में बड़ा मुद्दा बनता है, तो इसमें विधायकों की क्या भूमिका है. शराब नीति में बदलाव का फैसला कैबिनेट का था, इसलिए ज्यादा से ज्यादा वे विधायक हो सकते हैं, जो मंत्री बने और कैबिनेट के फैसलों में शामिल रहे. 

अरविंद केजरीवाल ने भले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया हो, और चुनावों के जरिये अग्नि परीक्षा दे रहे हों, लेकिन सत्ता में वापसी तो तभी हो सकेगी जब लोग इसे राजनीतिक नजरिये से देखें और विरोधियों की राजनीतिक साजिश वाली अरविंद केजरीवाल की बात मान लें. 

कांग्रेस भी बीजेपी जैसी ही चुनौती है

लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का चुनावी गठबंधन था, लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव दोनो अलग अलग लड़ रहे हैं, यानी दोनो एक दूसरे के खिलाफ दो-दो हाथ करते हुए चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं. 

और जैसे कांग्रेस नेता अरविंद केजरीवाल के खिलाफ हमलावर हैं, अरविंद केजरीवाल भी वैसी ही बातें कर रहे हैं. अरविंद केजरीवाल का ये कहना कि उनका कोई भी रिश्तेदार या भाई भतीजा राजनीति में नहीं है, और इसलिए वो परिवारवाद नहीं करते – जाहिर है, ये बातें तो कांग्रेस को केंद्र में रखकर ही कही जा रही हैं.

ऐसे में कांग्रेस का भी आक्रामक होना स्वाभाविक है. कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित एक इंटरव्यू में कहते हैं, भ्रष्टाचार इसलिए बड़ा मुद्दा है, क्योंकि आम आदमी पार्टी हमेशा ईमानदारी की बात करती रही है… जो पार्टी झूठ बोलकर शुरू होती है, उस पर विश्वास करना मुश्किल है… उनके बचाव में जो बातें हो रही हैं, उन पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता.

स्वाति मालीवाल केस का भी असर तो होगा ही

अगर आम आदमी पार्टी स्वाति मालीवाल केस को ये कह कर झुठलाने की कोशिश करती है कि ये सब बीजेपी के इशारे पर हुआ है, तो अरविंद केजरीवाल का स्टैंड उनको भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं रखता. 

स्वाति मालीवाल केस को लेकर जिस तरह से आम आदमी पार्टी के नेताओं संजय सिंह और आतिशी के बयानों में विरोधाभास देखने को मिला संदेह तो गहरा ही होता गया. इस मामले का कुछ न कुछ असर तो लोकसभा चुनाव में देखा ही जा चुका है, और मान कर चलना चाहिये कि दिल्ली विधानसभा चुनाव भी अछूता नहीं रहेगा.

ऐसे हालात में भला कैसे मान लिया जाये कि मौजूदा विधायकों का टिकट काट कर अरविंद केजरीवाल सत्ता में वापसी सुनिश्चित कर लेंगे? 

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