छत्तीसगढ़ के चर्चित कोयला लेवी घोटाला मामले में सोमवार को एक बार फिर बड़ी कानूनी हलचल देखने को मिली। एसीबी-ईओडब्ल्यू (ACB-EOW) की स्पेशल कोर्ट में मामले से जुड़े आरोपियों की पेशी हुई, जहाँ कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव, पूर्व विधायक चंद्रदेव राय और कांग्रेस नेता विनोद तिवारी कोर्ट पहुंचे। इस दौरान देवेंद्र यादव ने प्रदेश सरकार पर जमकर निशाना साधा।
देवेंद्र यादव का सरकार पर तीखा हमला
स्पेशल कोर्ट में पेशी के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है, लेकिन प्रदेश की मौजूदा सरकार पर न तो जनता को और न ही उन्हें कोई उम्मीद है।
देवेंद्र यादव ने आगे कहा कि लंबी जांच के बाद अब चार्जशीट पेश की जा रही है, लेकिन यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित लगती है। उन्होंने खुद को कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी का सिपाही बताते हुए कहा कि जेल की सलाखें भी पहले उनका हौसला नहीं तोड़ पाईं, ऐसे में इस तरह के षड्यंत्र उनके बुलंद इरादों को कभी कमजोर नहीं कर सकते।
बीजेपी पर ‘वाशिंग मशीन’ पॉलिटिक्स का आरोप
इस दौरान देवेंद्र यादव ने चिंतामणि महाराज का नाम लेते हुए भारतीय जनता पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि जब इस मामले की जांच शुरू हुई थी, तब एफआईआर (FIR) में चिंतामणि महाराज का नाम प्रमुखता से शामिल था। लेकिन, उनके बीजेपी में शामिल होते ही उनका नाम सूची से गायब हो गया। यादव ने इसे बीजेपी की सोची-समझी रणनीति बताते हुए कहा कि पार्टी बदलते ही तमाम मामले और दाग कैसे धुल जाते हैं, यह उसका एक जीवंत उदाहरण है।
क्या है पूरा कोयला घोटाला? (कोयला लेवी प्रकरण)
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह बहुचर्चित मामला साल 2020 से 2022 के बीच का है, जब छत्तीसगढ़ में कोयला परिवहन पर अवैध शुल्क (लेवी) वसूले जाने का खेल चल रहा था।
- सिस्टम में बदलाव: ऑनलाइन ई-परमिट प्रक्रिया को दरकिनार कर मैनुअल एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) व्यवस्था लागू की गई थी।
- अवैध वसूली: खदानों से कोयला निकासी और परिवहन के बदले प्रति टन 25 रुपये की अवैध लेवी वसूली का एक समानांतर सिंडिकेट चलाया जा रहा था।
- 500 करोड़ से अधिक की काली कमाई: एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक, इस गैरकानूनी नेटवर्क के जरिए 500 से 540 करोड़ रुपये से ज्यादा की काली कमाई जुटाई गई। रोजाना 2 से 3 करोड़ रुपये तक की वसूली होती थी, जिसका एक बड़ा हिस्सा राजनेताओं, बिचौलियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बांटा जाता था।
इस मामले में ईओडब्ल्यू की स्पेशल कोर्ट द्वारा अंतिम चालान पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है, जिस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।