जगदलपुर: दुनिया भर में अपने अनूठे स्वरूप के लिए प्रसिद्ध 75 दिनों तक चलने वाला ‘बस्तर दशहरा’ इन दिनों अपने चरम पर है। पर्व के दौरान बुधवार की देर रात एक बेहद दिलचस्प और प्राचीन रस्म “भीतर रैनी” पूरी की गई। इस रस्म के तहत करीब 600 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए आदिवासी ग्रामीणों ने मां दंतेश्वरी के छत्र से सुसज्जित आठ पहियों वाले विशालकाय रथ को खींचकर उसकी परिक्रमा की और आधी रात को इसे ‘चुराकर’ जंगल की ओर ले गए।
क्या है रथ चुराने की यह अनोखी परंपरा?
बस्तर दशहरा की इस सदियों पुरानी रस्म के पीछे एक ऐतिहासिक कहानी जुड़ी हुई है। परंपरा के अनुसार, आधी रात को विशालकाय रथ को उसकी जगह से हटाकर माड़िया जनजाति के लोग शहर से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाते हैं।
राजशाही दौर की मान्यताओं के मुताबिक, एक बार राजा से नाराजगी के चलते माड़िया जनजाति के लोगों ने इस रथ को छिपा दिया था। इसके बाद अगले दिन राजा खुद कुम्हड़ाकोट पहुंचे थे और ग्रामीणों को मनाकर उनके साथ नए चावल से बनी खीर (‘नवा खानी’) का सेवन किया था। इस समझौते और मेल-मिलाप के बाद रथ को वापस शाही सम्मान के साथ दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता है, जिसे ‘बाहर रैनी’ की रस्म कहा जाता है। आज भी इस परंपरा को आदिवासी समुदाय पूरी आस्था के साथ निभा रहा है।
उमड़ता है हजारों का जनसैलाब
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हज़ारों की संख्या में आदिवासी ग्रामीण और सैलानी कुम्हड़ाकोट तक का सफर तय करते हैं। रात के सन्नाटे में इस विशालकाय रथ को खींचने का यह नज़ारा बेहद रोमांचक होता है। इस अंतिम रथ परिक्रमा को देखने के लिए श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता है।
परंपरा के अगले चरण में, बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव नाराज ग्रामीणों को मनाने और ‘नवा खानी’ की रस्म निभाने के लिए कुम्हड़ाकोट पहुंचते हैं। इसके बाद इस विशालकाय रथ को वापस खींचकर दंतेश्वरी मंदिर परिसर में लाया जाता है।