“सूरजपुर में पत्रकारों पर हमला: खदान क्षेत्र में खुली गुंडागर्दी, क्या पत्रकारिता अब सुरक्षित है?”

पत्रकारों पर हमला


सूरजपुर में पत्रकारों पर हमला: खदान क्षेत्र में सुरक्षा का बड़ा सवाल

सूरजपुर, छत्तीसगढ़:
सूरजपुर जिले के भास्कर पारा कोयला खदान क्षेत्र में 19 अप्रैल को एक बेहद गंभीर और चिंताजनक घटना घटित हुई है, जिसने न केवल पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता पर भी बड़ा हमला किया है। पत्रकारों द्वारा खदान क्षेत्र की अनियमितताओं को उजागर करने की कोशिश के दौरान उन्हें बंधक बना लिया गया, मारा-पीटा गया, और उनका सामना मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से किया गया। यह घटना लोकतंत्र पर एक गंभीर प्रहार मानी जा रही है, क्योंकि पत्रकारों को इस तरह दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक समाज में बहुत ही घातक है।

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

रविवार, 19 अप्रैल को पत्रकारों चंद्र प्रकाश साहू (लोक विचार न्यूज़), लोकेश गोस्वामी (सीजी पब्लिक न्यूज़), और मनीष जायसवाल (सीजी वाल न्यूज़) को खदान क्षेत्र में मौजूद अनियमितताओं और स्थानीय विरोध की सूचना मिली थी। जब ये पत्रकार घटना स्थल पर पहुंचे और अपनी रिपोर्टिंग करने लगे, तो उन्हें वहां तैनात सुरक्षा गार्डों ने रिपोर्टिंग से रोकने की कोशिश की।

पत्रकारों ने वहां खदान के मुख्य गेट के पास स्थित अमृत सरोवर योजना के तहत बने तालाब और स्नान गृह का निरीक्षण किया। खदान के क्षेत्र में सुरक्षा मानकों की अनदेखी स्पष्ट रूप से सामने आई थी, जैसे:

  • खदान के आसपास स्पष्ट फेंसिंग का अभाव।
  • सुरक्षा चेतावनी बोर्डों की कमी।
  • ग्रामीणों का आना-जाना बिना किसी रोक-टोक के जारी रहना।

पत्रकारों ने जब यह सब रिकार्ड करना शुरू किया, तो उनकी रिपोर्टिंग को गार्ड और सुपरवाइजर ने रोकने की कोशिश की। इसके बाद, स्थिति और तनावपूर्ण हो गई।

हमले का खौफनाक मोड़

करीब 4 बजे, एक सफेद बोलेरो गाड़ी में सवार 5-6 हमलावर मौके पर पहुंचे और पत्रकारों पर हमला कर दिया। इस हमले में:

  • कैमरा और माइक छीन लिए गए।
  • मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए।
  • पत्रकारों को गालियाँ दी गईं और धक्का-मुक्की की गई।
  • चंद्र प्रकाश साहू को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

इसके बाद, पत्रकारों को जबरन वाहन में बैठाकर खदान परिसर की ओर ले जाया गया, जहां उन्हें बंधक बना लिया गया। वहां पत्रकारों से:

  • उनका आधार कार्ड और पहचान पत्र छीन लिया गया।
  • उनकी फोटो खींची गई।
  • जमीन पर बैठाकर उनसे पूछताछ की गई और धमकियां दी गईं।

सुरक्षा कर्मियों ने पत्रकारों पर दबाव डाला कि वे वीडियो में यह कहें कि वे “खदान में अवैध रूप से घुसे थे”, हालांकि पत्रकारों का कहना था कि वे सिर्फ सड़क से रिपोर्टिंग कर रहे थे।

दबाव और अपमान

पूछताछ के दौरान पत्रकारों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया और उन्हें धमकाया गया:

“बड़े पत्रकार यहां आते हैं, पैसा लेकर चले जाते हैं… तुम जैसे छोटे पत्रकार यहां कैसे आ गए?”

आखिरकार, तीनों पत्रकारों को 3-4 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया। इस दौरान उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी गई और उन्हें किसी से भी संपर्क करने की अनुमति नहीं दी गई।

सबूतों को मिटाने की कोशिश

हमलावरों ने पत्रकारों के फोन से सभी वीडियो फुटेज डिलीट कर दिए और उनकी कार को भी कब्जे में रखा। यह पूरी घटना जैसे किसी अपहरण जैसा बन गई थी।

मनीष जायसवाल की तबीयत बिगड़ी

मनीष जायसवाल की तबीयत खराब हो गई और उनका शुगर लेवल गिर गया। उन्हें चाय दी गई, लेकिन यह पूरी घटना की गंभीरता को कम नहीं करता। यह दिखाता है कि हमलावरों ने सिर्फ शारीरिक प्रताड़ना नहीं की, बल्कि मानसिक रूप से भी पत्रकारों को तोड़ा।

सवाल: क्या पत्रकारिता अब सुरक्षित है?

यह घटना कई गंभीर सवालों को जन्म देती है:

  • क्या पत्रकार अब अपनी रिपोर्टिंग में स्वतंत्र रह पाएंगे?
  • क्या खदान और उद्योग क्षेत्रों में “नो रिपोर्टिंग ज़ोन” लागू हो गया है?
  • क्या सच दिखाने वालों को इसी तरह दबाया जाएगा?

कार्रवाई की मांग

हमर उत्थान सेवा समिति ने थाना झिलमिली में इस पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई है। समिति ने निम्नलिखित मांगें की हैं:

  • निष्पक्ष जांच
  • सभी आरोपियों की गिरफ्तारी
  • पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना

प्रशासन पर नजर

यह घटना लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर एक सीधा हमला है। यदि पत्रकारों को इस तरह से दबाया जाता है, तो आम जनता तक सच कैसे पहुंचेगा? प्रशासन को इस मामले में क्या कदम उठाना चाहिए, यह अब देखना होगा। क्या यह मामला दबा दिया जाएगा, या फिर पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई सख्त कार्रवाई की जाएगी?

यह घटना छत्तीसगढ़ के पत्रकार सुरक्षा के मुद्दे को और अधिक गंभीर बना सकती है और राज्य भर में एक बड़ी बहस का कारण बन सकती है।

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