तेल कंपनियों का घाटा
लेख:
तेल कंपनियों का बढ़ता घाटा: क्या 29 अप्रैल तक कीमतें नहीं बढ़ेंगी?
कच्चे तेल की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि ने भारतीय तेल कंपनियों को आर्थिक दबाव में डाल दिया है। खाड़ी क्षेत्र में फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 93% की वृद्धि हो गई है। इस उछाल ने प्रमुख रिफाइनरियों जैसे इंडियन ऑयल, एचपीसीएल, बीपीसीएल और रिलायंस के मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस संकट के बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें अब तक स्थिर रखी गई हैं, लेकिन क्या यह स्थिरता लंबे समय तक बनी रहेगी?
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
- 28 फरवरी 2026 से जारी संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमत को 136.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है।
- अमेरिका, रूस और यूराल्स जैसे देशों में भी तेल की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं, जिससे भारत के लिए यह संकट और भी गहरा हो गया है।
- कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें भारतीय तेल कंपनियों के लिए गंभीर आर्थिक संकट का कारण बन रही हैं।
भारत में तेल कीमतों की स्थिरता
- भारत में तेल कंपनियों ने सरकार और तेल उत्पादकों के दबाव में कीमतों को स्थिर बनाए रखा है, जबकि दुनिया के कई देशों ने कीमतों में बढ़ोतरी की है।
- मोदी सरकार फिलहाल किसी बड़े फैसले की स्थिति में नहीं है, खासकर जब अप्रैल 2026 तक विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए, सरकार किसी भी कीमत पर चुनावी राजनीति में तेल कीमतों में वृद्धि नहीं चाहती।
- राजनीतिक समीकरण और आगामी चुनावों को देखते हुए, तेल की कीमतों में वृद्धि की संभावना 29 अप्रैल तक कम ही है।
आंतर्राष्ट्रीय संकट और भारत पर असर
- होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर प्रभाव पड़ा है। भारत के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि भारत अपने कच्चे तेल का 60% इसी मार्ग से आयात करता है।
- दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति में भारी कमी आई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि हो रही है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यह संकट समाप्त नहीं होता, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा।
भारत की आर्थिक स्थिति पर असर
- विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमत एक साल तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है, तो भारत का आयात बिल बेतहाशा बढ़ जाएगा। इससे व्यापार घाटा 80 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है, जो देश की GDP का 2.1% होगा।
- रेटिंग एजेंसी इक्रा ने चेतावनी दी है कि लंबा संघर्ष भारत की ऊर्जा आपूर्ति और शिपिंग मार्गों को प्रभावित कर सकता है, जिससे व्यापक आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।
महंगाई और रुपये पर दबाव
- कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से महंगाई में और बढ़ोतरी हो सकती है। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे आम जनता की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
- व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ने से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जो पहले ही कमजोर है।