9 साल बाद जेल से रिहाई! हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद उम्रकैद की सजा रद्द, आरोपी बरी

हाईकोर्ट

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बहुचर्चित हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए नौ साल से जेल में बंद आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में तथ्यों और साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया। इसके चलते एक व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रहना पड़ा, जो न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

जबलपुर हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ट्रायल कोर्ट मामले की वास्तविक दिशा से भटक गया था और उपलब्ध साक्ष्यों के बावजूद दोषसिद्धि का निर्णय पारित कर दिया गया। अदालत ने इसे अपीलकर्ता के साथ घोर अन्याय बताया।

क्या था पूरा मामला?

रायसेन जिले के मंडीदीप निवासी संजय गुप्ता को वर्ष 2017 में 12 वर्षीय बालक नितिन की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास और 17 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोप था कि उसने बच्चे को अपने घर बुलाकर उसकी हत्या कर दी और शव को बोरे में भरकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया।

इसके बाद से संजय गुप्ता लगातार जेल में सजा काट रहा था। मामले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, जिस पर विस्तृत सुनवाई हुई।

बचाव पक्ष ने उठाए कई सवाल

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने कई महत्वपूर्ण तथ्य अदालत के सामने रखे। उन्होंने बताया कि कथित “लास्ट सीन” गवाह के बयान में गंभीर विरोधाभास थे। गवाह ने बच्चे को आरोपी के साथ नहीं बल्कि उसके बेटे के साथ देखने की बात कही थी।

इसके अलावा एक अन्य गवाह ने बताया कि घटना वाले दिन संजय गुप्ता सुबह से शाम तक फैक्ट्री में ड्यूटी कर रहा था और रात में भोपाल में एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल था। इससे उसकी मौजूदगी को लेकर अभियोजन पक्ष की कहानी कमजोर पड़ गई।

जांच में मिली कई खामियां

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि जांच प्रक्रिया में कई गंभीर कमियां थीं।

  • बाथरूम से कथित रक्त बरामदगी का रिकॉर्ड पंचनामा में नहीं था।
  • बरामद चप्पल का आकार तक दर्ज नहीं किया गया।
  • हथौड़े और चोट के बीच कोई मेडिकल संबंध स्थापित नहीं हुआ।
  • पेचकस पर फिंगरप्रिंट जांच नहीं कराई गई।
  • जब्त सामग्री को महीनों तक थाने में रखा गया।
  • एफएसएल जांच के लिए साक्ष्य काफी देरी से भेजे गए।
  • गवाहों के बयान केस डायरी और अदालत में अलग-अलग पाए गए।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य वाले मामलों में हर कड़ी का मजबूत होना आवश्यक है। यदि एक भी महत्वपूर्ण कड़ी टूटती है तो दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध शरद बिरधीचंद सारदा मामले का हवाला देते हुए कहा कि संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया। अदालत ने संजय गुप्ता को सभी आरोपों से बरी करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश जारी किया।

यह फैसला एक बार फिर बताता है कि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और निष्पक्ष जांच कितनी महत्वपूर्ण होती है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि उच्च न्यायालय गलत फैसलों की समीक्षा कर न्याय सुनिश्चित करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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