नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का वायु प्रदूषण (Air Pollution) एक गंभीर और पुरानी समस्या बना हुआ है, जिससे हर साल लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में दिल्ली की हवा को लेकर एक राहत भरी उम्मीद के साथ-साथ बड़ी चेतावनी भी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि तय समय पर सख्त कदम उठाए गए, तो आने वाले सालों में हवा साफ हो सकती है, लेकिन जरा सी भी लापरवाही लोगों की सेहत पर भारी पड़ सकती है।
1. क्या कहती है रिपोर्ट? (दिल्ली के लिए राहत और चेतावनी)
सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, यदि दिल्ली 2026 से तय समयसीमा के तहत मौजूदा राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों (Air Quality Standards) को सफलतापूर्वक हासिल कर लेती है, तो साल 2040 तक लोगों के शरीर में खतरनाक PM2.5 के पहुंचने का खतरा या उसका बोझ करीब 20 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
वहीं, दूसरी तरफ चेतावनी दी गई है कि अगर इन मानकों को लागू करने में करीब 8 साल की भी देरी हुई, तो PM2.5 के संपर्क में आने वाली राहत घटकर महज 10 प्रतिशत ही रह जाएगी। यानी नियमों की अनदेखी से प्रदूषण का असर लंबे समय तक बना रहेगा और नागरिकों की सेहत पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेगा।
2. UNEP और CCAC की ग्लोबल रिपोर्ट जारी
यह अहम रिपोर्ट सोमवार, 7 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और क्लाइमेट एंड क्लीन एयर कोएलिशन (CCAC) द्वारा संयुक्त रूप से जारी की गई है। इस रिपोर्ट का नाम ‘हिडन एसेट्स: द इकोनॉमिक एंड हेल्थ केस फॉर क्लाइमेट एंड क्लीन एयर एक्शन’ है। इसे जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण से एक साथ निपटने के आर्थिक और स्वास्थ्य प्रभावों का पहला बड़ा वैश्विक आकलन माना जा रहा है।
3. प्रदूषण और क्लाइमेट चेंज से निपटने के 25 अचूक उपाय
रिपोर्ट में दोनों गंभीर समस्याओं से एक साथ पार पाने के लिए 25 प्रभावी उपाय सुझाए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
- अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना।
- ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) में सुधार करना।
- घरों में खाना पकाने और सर्दियों में गर्माहट के लिए स्वच्छ साधनों का उपयोग बढ़ाना।
- गाड़ियों से निकलने वाले धुएं (वाहन उत्सर्जन) और ईंधन दक्षता के नियमों को और सख्त करना।
रिपोर्ट का दावा है कि यदि इन 25 उपायों को सख्ती से लागू किया जाए, तो साल 2035 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को तगड़ा फायदा हो सकता है, जो कि वैश्विक जीडीपी (GDP) का 2.8 प्रतिशत तक हो सकता है। यह फायदा साल 2050 तक बढ़कर 4.5% और 2100 तक 11.4% तक पहुंच सकता है।
4. देरी करने पर होगा भारी नुकसान और संस्थागत बाधाएं
रिपोर्ट में साफ तौर पर चेताया गया है कि यदि इन सुधारों को लागू करने में हर साल की देरी होती है, तो वैश्विक स्तर पर जीडीपी को 0.5 प्रतिशत से ज्यादा यानी 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान हो सकता है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनिया भर में ऐसे सुधारों को लागू करने में औसतन 7.5 से 8 साल की देरी का अनुमान है, जिसमें सबसे बड़ी रुकावट संस्थागत बाधाएं (Institutional Barriers) हैं। जानकारों का कहना है कि अगर समय रहते नीतियां जमीन पर नहीं उतरीं, तो पर्यावरण सुधार के साथ-साथ मिलने वाले आर्थिक और स्वास्थ्य लाभ भी आधे रह जाएंगे।