बस्तर: आज शिक्षक दिवस पर चारों तरफ शिक्षकों के सम्मान और उनकी तारीफों के कसीदे पढ़े जा रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में कुछ ऐसे भी कर्मवीर शिक्षक हैं, जिनकी असल परीक्षा स्कूल के क्लासरूम में नहीं, बल्कि वहां तक पहुंचने के रास्ते पर होती है। इन शिक्षकों के लिए बच्चों को पढ़ाना महज एक नौकरी नहीं, बल्कि एक ऐसा जज्बा है जिसके आगे मौत का खतरा भी छोटा पड़ जाता है। उफनती नदियां, टूटे हुए पुल और दुर्गम रास्ते इनके हौसले को नहीं डिगा पाते और ये हर रोज अपनी जान दांव पर लगाकर बच्चों का भविष्य संवारने स्कूल पहुंचते हैं।
जान हथेली पर रखकर तय होता है स्कूल का सफर
बस्तर के बास्तानार विकासखंड के लालागुड़ा गांव में प्राथमिक, माध्यमिक और हाई स्कूल संचालित हैं, जहां लगभग 90 बच्चे अपनी तालीम हासिल कर रहे हैं। इन बच्चों तक ज्ञान की रोशनी पहुंचाने वाले शिक्षकों को हर रोज किसी जंग के मैदान जैसा सफर तय करना पड़ता है।
- खतरनाक नदी पार करना: शिक्षक सुबह अपनी बाइक से निकलते हैं, नदी के किनारे गाड़ी खड़ी करते हैं और फिर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर तेज बहाव वाले ठंडे पानी को पार करते हैं।
- पैदल लंबा सफर: नदी पार करने के बाद भी राहत नहीं मिलती, इसके बाद करीब 3 किलोमीटर का पैदल रास्ता नापकर वे स्कूल पहुंच पाते हैं।
- एक साल बाद भी हालात जस के तस: स्थानीय लोगों और शिक्षकों के मुताबिक, 26 अगस्त 2025 को आई भीषण बाढ़ में यहां की सड़कें और पुल बह गए थे। एक साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी हालात नहीं सुधरे हैं, और जान जोखिम में डालकर नदी पार करना ही इनकी रोजमर्रा की मजबूरी बन चुका है। बस्तर के कई अंदरूनी इलाकों में आज भी शिक्षक नाव के सहारे या तैरकर स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं।
नई मुसीबत: डिजिटल अटेंडेंस और नेटवर्क का रोना
दुर्गम इलाकों में इन शिक्षकों की मुश्किलें सिर्फ रास्ते की बाधाओं तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक व्यवस्थाएं भी इनके लिए सिरदर्द बन गई हैं। ‘वीएसके ऐप’ (VSK App) के जरिए ऑनलाइन या डिजिटल अटेंडेंस दर्ज कराने का नया नियम इन इलाकों में परेशानी का सबब बन गया है।
एक तरफ जहां नेटवर्क और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं, वहीं शिक्षक पहले जानलेवा रास्तों और उफनती नदी से जंग जीतते हैं और फिर स्कूल पहुंचकर नेटवर्क की तलाश में डिजिटल अटेंडेंस की चुनौती से जूझते हैं।
इस मामले पर शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव का कहना है कि वीएसके ऐप के जरिए कई जिलों में अच्छी संख्या में उपस्थिति दर्ज हो रही है (जैसे कोंडागांव में 92% और नारायणपुर में 78%)। हालांकि, मंत्री ने यह भी माना कि प्रदेश के करीब 700 ऐसे स्कूल हैं जहां ऐप काम नहीं कर रहा है, जिसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है।
हकीकत जो सोचने पर मजबूर कर दे
एक तरफ सरकार शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और हाईटेक बनाने के दावे कर रही है, वहीं बस्तर के इन अंदरूनी इलाकों की यह कड़वी तस्वीरें बुनियादी विकास की पोल खोलने के लिए काफी हैं। जहां स्कूल पहुंचने के लिए पहले जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़े, वहां ये गुरु सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं दे रहे, बल्कि अपने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा से बच्चों को जिंदगी का सबसे बड़ा हौसले और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ा रहे हैं।