“बंदूक से विकास की ओर: सुकमा का तुंगल इको-पर्यटन केंद्र, नक्सल प्रभावित महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का प्रतीक!”

तुंगल इको-पर्यटन केंद्र


सुकमा जिले का तुंगल इको-पर्यटन केंद्र: एक प्रेरक कहानी

रायपुर, 16 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में वन विभाग की एक सराहनीय पहल ने नक्सल प्रभावित क्षेत्र में विकास और पुनर्वास की एक नई मिसाल पेश की है। तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बन चुका है, जो न केवल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का अवसर प्रदान कर रहा है, बल्कि उन महिलाओं के जीवन को भी संवार रहा है, जिन्होंने कभी नक्सलवाद के रास्ते पर कदम रखा था।

तुंगल इको-पर्यटन केंद्र की शुरुआत और विकास

सुकमा नगर से सिर्फ एक किलोमीटर दूर स्थित तुंगल इको-पर्यटन केंद्र पहले उपेक्षित और जर्जर था, लेकिन वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में वन विभाग ने इसे एक खूबसूरत पर्यटन स्थल में तब्दील कर दिया। अब यह केंद्र न केवल स्थानीय निवासियों, बल्कि पड़ोसी राज्य ओडिशा से आने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहा है।

“तुंगल नेचर कैफे” – नक्सल प्रभावित महिलाओं का संघर्ष और आत्मनिर्भरता

इस केंद्र का एक अनूठा पहलू है “तुंगल नेचर कैफे”, जिसे एक महिला स्वयं सहायता समूह द्वारा संचालित किया जा रहा है। इस समूह की 10 महिलाएँ नक्सलवाद से प्रभावित रही हैं। इनमें से 5 महिलाएँ वे हैं जिन्होंने नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया, जबकि बाकी की महिलाएँ नक्सल हिंसा के प्रभाव से गुजर चुकी थीं।

इन महिलाओं को जगदलपुर और सुकमा के संस्थानों में विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिससे उन्हें न केवल व्यावसायिक कौशल प्राप्त हुआ, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया। आज ये महिलाएँ स्वावलंबन और आत्मसम्मान का प्रतीक बनकर पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं।

विकास की गति: पर्यटकों की संख्या और आय में वृद्धि

तुंगल इको-पर्यटन केंद्र की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 को शुरू होने के बाद, तीन महीने में 8,889 पर्यटक इस स्थल पर आए। 30 मार्च 2026 तक केंद्र ने लगभग 2.92 लाख रुपये की आय भी अर्जित की। यह आंकड़ा इस बात को साबित करता है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर किसी भी स्थान का विकास संभव है।

पर्यटक यहाँ न केवल स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेते हैं, बल्कि तुंगल डैम में कयाकिंग, पैडल बोटिंग और बाँस राफ्टिंग जैसी रोमांचक गतिविधियों का भी आनंद ले रहे हैं। यह केंद्र न केवल मनोरंजन का स्रोत बन चुका है, बल्कि पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

समाज में बदलाव: तुंगल का उदाहरण

तुंगल इको-पर्यटन केंद्र केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह एक प्रेरक उदाहरण है, जो बताता है कि जब प्राकृतिक संसाधनों का सही तरीके से उपयोग किया जाता है, तो इसका प्रभाव न केवल पर्यावरण पर पड़ता है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक विकास में भी सहायक बनता है। यह केंद्र नक्सल प्रभावित महिलाओं की पुनर्वास प्रक्रिया और उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ावा दे रहा है।

वन विभाग की दूरदर्शी सोच और स्थानीय विकास

वन विभाग की दूरदर्शी सोच और सही मार्गदर्शन के साथ यह पहल एक आदर्श बन गई है। यह दिखाता है कि प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग के साथ-साथ मानव विकास को जोड़कर, समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। तुंगल इको-पर्यटन केंद्र बस्तर की बदलती तस्वीर को एक नई दिशा प्रदान कर रहा है।

मुख्य बिंदु:

  • तुंगल इको-पर्यटन केंद्र का विकास वन विभाग के प्रयासों से हुआ।
  • “तुंगल नेचर कैफे” के जरिए नक्सल प्रभावित महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता मिली।
  • तुंगल डैम में रोमांचक गतिविधियाँ जैसे कयाकिंग और पैडल बोटिंग पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं।
  • 8,889 पर्यटक तीन महीनों में इस केंद्र का दौरा कर चुके हैं और 2.92 लाख रुपये की आय अर्जित हुई।
  • यह पहल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सामाजिक बदलाव का बेहतरीन उदाहरण है।

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