CG High Court Rape Case
लेख:
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए दुष्कर्म के आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। सात साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में, जहां मेडिकल रिपोर्ट ने आरोपी के खिलाफ स्पष्ट सबूत नहीं दिए थे, वहीं पीड़िता की गवाही को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
क्या है मामला?
यह मामला बेमेतरा जिले का है, जहां एक सात साल की बच्ची अपने माता-पिता के काम पर बाहर जाने के दौरान अपने बड़े पिता के घर पर रह रही थी। एक दिन बच्ची देर रात तक घर वापस नहीं लौटी। उसकी बहन ने उसे पड़ोसी के घर से वापस लाकर पाया, और जब बच्ची घर लौट आई तो उसने बताया कि पड़ोसी ने उसके साथ दुष्कर्म किया था। इस घटना की शिकायत 17 मई 2022 को दर्ज कराई गई।
पुलिस जांच और मेडिकल रिपोर्ट:
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। जांच के दौरान पुलिस ने मेडिकल परीक्षण किया, जिसमें दुष्कर्म का कोई स्पष्ट शारीरिक सबूत नहीं पाया गया। इसके साथ ही आरोपी का डीएनए टेस्ट भी नकारात्मक आया। बावजूद इसके, ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों को विश्वासनीय मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
आरोपी की अपील और कोर्ट का निर्णय:
आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की और खुद को निर्दोष बताया। उसने आरोप लगाया कि उसे झूठा फंसाया गया है और गवाहों के बयानों में विरोधाभास है। इसके अलावा, आरोपी ने यह भी दावा किया कि वह गूंगा-बहरा और अशिक्षित है, जिससे उसे कानूनी प्रक्रिया को ठीक से समझने में समस्या होती है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैज्ञानिक या मेडिकल रिपोर्ट केवल एक राय होती है, और मजबूत प्रत्यक्ष गवाही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी माना कि यदि पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद हो, तो दोषसिद्धि उसी पर आधारित हो सकती है, भले ही मेडिकल साक्ष्य आरोपित के पक्ष में क्यों न हों।
समाज के लिए अहम टिप्पणी:
सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने समाज में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर चिंता जताई। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में एक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, ताकि दोषियों को सजा मिल सके और पीड़ितों को न्याय मिल सके।
अदालत का फैसला:
अंत में, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने दोषी को दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि चिकित्सा या वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में भी, यदि प्रत्यक्ष गवाही मजबूत और भरोसेमंद है, तो वह न्यायिक प्रक्रिया में निर्णायक हो सकती है। यह अदालत का निर्णय उन मामलों में एक मिसाल बन सकता है, जहां समाज में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामलों में न्याय की आवश्यकता है।