राजस्थान: प्रसव के बाद डायलिसिस पर मजबूर माताओं की आपबीती

राजस्थान में सरकारी अस्पतालों में प्रसव के बाद बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति ने एक मानवीय संकट को जन्म दिया है। कोटा, बीकानेर, जोधपुर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जैसे ज़िलो में हाल के महीनों में प्रसव के बाद महिलाओं की तबियत बिगड़ने और कई मौतों की दुखद घटनाएं सामने आई हैं।

इच्छामृत्यु की मांग क्यों? कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती पांच महिलाएं पिंकी ऐरवाल ,रागिनी मीणा, धन्ली सुमन, आरती चोबदार और सुशीला महावर—पिछले 72 दिनों से सप्ताह में दो बार डायलिसिस कराने को मजबूर हैं। प्रसव के बाद उनकी किडनी फेल हो गई है। इन महिलाओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर या तो अपनी किडनी ट्रांसप्लांट करवाने की मांग की है, या फिर उन्हें ‘इच्छामृत्यु’ (Euthanasia) की अनुमति देने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि वे हर 48 घंटे में होने वाले डायलिसिस के दर्द और शारीरिक मानसिक पीड़ा से थक चुकी है जिससे उनके परिवार भी आर्थिक रूप से बर्बाद हो गए है

प्रशासनिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया घटनाओं के बाद जांच समितियां बनीं और ऑपरेशन थिएटर के नमूने जांच के लिए भेजे गए, लेकिन दो महीने बाद भी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर का कहना है कि इन मौतों को एक ही कारण से नहीं जोड़ा जा सकता। वहीं, विपक्ष सरकार पर मामले को दबाने का आरोप लगा रहा हैदबाव बढ़ने पर प्रशासन ने इन पांच महिलाओं के लिए निशुल्क डायलिसिस और भविष्य में निशुल्क किडनी ट्रांसप्लांट का लिखित आश्वासन दिया है।

गंभीर स्थिति इन महिलाओं के नवजात बच्चे अपनी माओं से दूर रहने को मजबूर है पोषण और देखभाल के अभाव में बच्चों की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञ छाया पचौली ने इसे मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियादी विफलता बताते हुए सरकार से पूर्ण पारदर्शिता और जाच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।

Disclaimer: This report is based on information published by BBC Hindi (bbc.com). The content provided here is a summary of the news report regarding the health crisis in Rajasthan. The information reflects the events as reported by the source at the time of publication. We do not independently verify the medical or administrative details mentioned

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