बीते लगभग तीन दिनों से इजरायल, गाजा और लेबनान के बीच संघर्ष थमा हुआ था, लेकिन गुरुवार को फिर से बेरूत पर मिसाइलें बरसीं। इन मिसाइल हमलों में 22 लोगों की मौत हो गई, जबकि 117 लोग जख्मी हुए हैं। इजरायल ने लेबनान में सक्रिय उग्रवादी संगठन हिजबुल्लाह पर हमले तेज कर दिए हैं। इजरायली हमलों का लेबनान में ऐसा खौफ है कि सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं तो वहीं लाखों लोगों ने पलायन कर लिया है। लेबनान पर इजरायल को हमले जारी रखने में कोई परेशानी भी नहीं है, लेकिन असल संकट ईरान पर फैसले को लेकर है।
गुरुवार को देर रात तक बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में सुरक्षा समिति की मीटिंग चली, लेकिन ईरान पर हमले को लेकर कोई फैसला नहीं हो सका। अब इस बारे में एक बार फिर से मंथन किया जाएगा। बैठक बेनतीजा रहने की वजह यह थी कि कैबिनेट में ही दो राय थीं। एक राय थी कि ईरान पर तगड़ा हमला किया जाए। इसमें उसके पावर ग्रिड और परमाणु ठिकानों को भी निशाना बनाया जाए। वहीं कुछ लोगों का कहना था कि ईरान को सिर्फ ताकत दिखाने के लिए हमला हो।
दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी 16 दिनों के बाद नेतन्याहू को फोन किया था। उनका कहना था कि ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना न बनाया जाए। इससे भीषण युद्ध छिड़ सकता है और नरसंहार के हालात हो सकते हैं। यही नहीं बाइडेन का कहना है कि ईरान के ऑइल एक्सपोर्ट फैसिलिटीज पर भी हमला न हो। अमेरिका का कहना है कि इजरायल की ओर से ईरान के सैन्य ठिकानों पर ही हमले हों। इससे ईरान को संदेश भी जाएगा और युद्ध इस लेवल तक नहीं भड़केगा कि त्रासदी जैसे हालात पैदा हो जाएं। ईरान ने 1 अक्टूबर को मिसाइलें दागी थीं। इसी के जवाब में इजरायल हमला करना चाहता है, लेकिन अब तक उस पर फैसला नहीं ले सका है कि कैसे अटैक किया जाए।
इजरायल के मंथन की वजह यह भी है कि अमेरिका, यूरोप और अरब के कई देश चाहते हैं कि ईरान की ऑइल फैसिलिटीज पर अटैक न हो। ऐसा हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर होगा और तेल की कीमतों में तेजी से इजाफा होगा। जो बाइडेन इसलिए भी रुकने की अपील कर रहे हैं ताकि इसकी छाया अमेरिकी चुनाव पर न पड़े, जहां 5 नवंबर को मतदान होना है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की शुक्रवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से तुर्कमेनिस्तान में मुलाकात होने वाली है। बीते कुछ सालों में दोनों देशों के बीच आर्थिक और सैन्य संबंध तेजी से बड़े हैं। यह ईरानी राष्ट्रपति की पहली मुलाकात होगी, जो हाल ही में नियुक्त हुए हैं। माना जा रहा है कि ईरान को रूस का समर्थन है, जबकि चीन भी इजरायल के ही खिलाफ है।