आर्मी कैंटोनमेंट की दिवाली और पिता की यादें: अभिनेत्री निमरत कौर ने शेयर किए बचपन के अनमोल पल

मुंबई: दीपावली का त्योहार हर किसी के जीवन में रोशनी, उमंग और ढेर सारी पुरानी यादें लेकर आता है। बॉलीवुड अभिनेत्री निमरत कौर के लिए भी यह पर्व बेहद खास है। दीपावली के इस खास मौके पर अभिनेत्री को अपना वह बचपन याद आया, जो उन्होंने भारतीय सेना के कैंटोनमेंट (छावनी) में बिताया था। इस दौरान उन्होंने अपने दिवंगत पिता से जुड़ी फुलझड़ियों की एक बेहद प्यारी याद भी साझा की है।

सैन्य परिवेश में बीता बचपन और कैंटोनमेंट की दिवाली

निमरत कौर का शुरुआती जीवन एक सैन्य परिवेश में बीता है, क्योंकि उनके पिता भारतीय सेना में एक अधिकारी थे। यही वजह है कि बचपन में उन्हें आर्मी कैंटोनमेंट के अनुशासन के साथ-साथ वहां मिलजुलकर मनाए जाने वाले त्योहारों को बेहद करीब से देखने का मौका मिला।

कैंटोनमेंट में दिवाली का माहौल किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता था। घरों की सजावट, दीपों की रोशनी और आसपास का खुशनुमा माहौल उनके बचपन का एक अहम हिस्सा रहा है। अभिनेत्री को आज भी वह दौर बखूबी याद है जब पूरा परिवार त्योहार की तैयारियों में जुटा रहता था।

पिता की छिपाई फुलझड़ियों का दिलचस्प किस्सा

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए निमरत ने पिता और फुलझड़ियों से जुड़ा एक प्यारा सा किस्सा साझा किया। उनके पिता द्वारा बच्चों के लिए छिपाकर रखी गई फुलझड़ियां उनकी दिवाली की यादों का सबसे खास हिस्सा हैं। यह छोटी-सी शरारत और प्यार भरा अंदाज आज भी उन्हें उन दिनों की याद दिलाता है, जब त्योहारों की छोटी-छोटी खुशियां ही सबसे बड़ी हुआ करती थीं।

निमरत कौर के पिता मेजर भूपेंद्र सिंह भारतीय सेना में अधिकारी थे। वर्ष 1994 में आतंकवादियों ने उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी। इतनी कम उम्र में पिता को खोना अभिनेत्री और उनके परिवार के लिए एक बेहद दर्दनाक और भावुक अध्याय रहा है। यही वजह है कि बचपन के वे पल और पिता के साथ बिताई गई दीपावली आज भी उनके दिल के बेहद करीब है और यह पर्व उनके लिए और अधिक भावनात्मक बन जाता है।

परिवार के साथ बिताए पलों में ही छिपी है त्योहार की असली खूबसूरती

आज बॉलीवुड में अपनी बेहतरीन अदायगी से एक खास पहचान बना चुकीं निमरत कौर, अपनी व्यस्तताओं के बीच भी उन पुरानी यादों को संजोकर रखती हैं। आर्मी कैंटोनमेंट का भव्य जश्न, बचपन की मासूमियत और पिता की लाई हुई फुलझड़ियों का वह किस्सा साबित करता है कि त्योहारों की असली चमक महंगे आयोजनों में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए अनमोल पलों में ही छिपी होती है।

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