बस्तर मॉडल: जब प्रशासन खुद पहुंचा जनता के द्वार, 8,241 फौती नामांतरण मामलों का हुआ रिकॉर्ड निपटारा

रायपुर। सरकारी दफ्तरों के चक्कर, वर्षों तक लंबित रहने वाले जमीन विवाद और फौती नामांतरण की जटिल प्रक्रिया ग्रामीण भारत की एक बड़ी समस्या रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए सुशासन का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसकी चर्चा अब प्रशासनिक हलकों में भी होने लगी है। डिजिटल तकनीक, जमीनी स्तर की सक्रियता और प्रशासनिक समन्वय के दम पर बस्तर ने फौती नामांतरण के हजारों मामलों का रिकॉर्ड समय में निराकरण कर नई मिसाल कायम की है।

क्या है बस्तर मॉडल?

फौती नामांतरण यानी किसी भू-स्वामी की मृत्यु के बाद उसके वारिसों के नाम जमीन का रिकॉर्ड दर्ज करना। आमतौर पर यह प्रक्रिया लंबी, जटिल और कागजी औपचारिकताओं से भरी होती है। कई परिवार वर्षों तक अपने अधिकार से वंचित रहते हैं।

बस्तर प्रशासन ने इस व्यवस्था को बदलते हुए “जनता दफ्तर आए” की जगह “प्रशासन जनता के पास जाए” का सिद्धांत अपनाया। इसी सोच ने बस्तर मॉडल को जन्म दिया।

611 गांवों में चला विशेष अभियान

जिले में चलाए गए विशेष अभियान के तहत प्रशासन ने गांव-गांव पहुंचकर डेटा एकत्र किया और लंबित मामलों की पहचान की।

अभियान की प्रमुख उपलब्धियां:

  • 611 गांवों से जानकारी जुटाई गई।
  • पिछले चार वर्षों में मृत 17,405 लोगों का डेटा संकलित किया गया।
  • 8,651 ऐसे मामलों की पहचान हुई जिनमें मृत व्यक्ति के नाम पर जमीन दर्ज थी।
  • 8,241 मामलों में नामांतरण प्रक्रिया पूरी कर आदेश जारी किए गए।
  • पूरे जिले में अब केवल 410 मामले शेष हैं।

यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि अधिकांश मामलों में परिवारों को आवेदन देने के लिए दफ्तर तक नहीं जाना पड़ा।

सफलता की असली ताकत बनी प्रशासनिक ‘त्रिमूर्ति’

इस अभियान की सफलता के पीछे ग्राम सचिव, पटवारी और कोटवार की संयुक्त भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही।

ग्राम सचिव की जिम्मेदारी

  • मृत्यु संबंधी रिकॉर्ड तैयार किए।
  • परिवारों को मृत्यु प्रमाण पत्र उपलब्ध कराए।
  • लंबित मामलों में विशेष अनुमति लेकर प्रमाण पत्र जारी करवाए।

पटवारी की भूमिका

  • डिजिटल भूमि रिकॉर्ड पोर्टल ‘भुइयां’ पर डेटा का मिलान किया।
  • जमीन वाले मृत व्यक्तियों की पहचान की।
  • वारिसों से संपर्क कर वंश वृक्ष तैयार किया।
  • ऑनलाइन नामांतरण प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

कोटवार का सामाजिक सत्यापन

  • गांवों में जाकर जानकारी का भौतिक सत्यापन किया।
  • फर्जी दावों और विवादों की संभावना खत्म की।
  • पारदर्शिता सुनिश्चित की।

तहसीलों में दिखा शानदार प्रदर्शन

बस्तर जिले की सभी 10 तहसीलों ने इस अभियान में उल्लेखनीय काम किया।

प्रमुख उपलब्धियां:

  • तोकापाल: 1,553 में से 1,454 मामलों का निराकरण।
  • बकावण्ड: 1,153 में से 1,142 मामले पूर्ण।
  • बस्तर तहसील: 1,087 में से 1,019 मामले निपटाए।
  • जगदलपुर: 1,061 में से 1,057 मामलों का समाधान।
  • भानपुरी: 1,018 में से 959 मामलों का निराकरण।
  • लोहण्डीगुड़ा: 805 में से 799 मामले पूर्ण।

इन आंकड़ों ने साबित किया कि बेहतर योजना और सतत निगरानी से बड़े प्रशासनिक लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।

किसानों और आदिवासियों को मिला सीधा लाभ

इस अभियान का असर सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है।

मुख्य लाभ:

  • बिचौलियों की भूमिका लगभग समाप्त हुई।
  • जमीन विवादों में कमी आई।
  • किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का लाभ मिलने का रास्ता आसान हुआ।
  • कृषि सब्सिडी और अन्य योजनाओं तक पहुंच बढ़ी।
  • परिवारों को मानसिक और आर्थिक परेशानी से राहत मिली।

अब अगले चरण की तैयारी

पहले चरण की सफलता के बाद बस्तर प्रशासन अब अगले मिशन की ओर बढ़ चुका है। लक्ष्य है कि पिछले 10 वर्षों से लंबित सभी फौती नामांतरण मामलों का शत-प्रतिशत निराकरण किया जाए।

बस्तर का यह मॉडल केवल राजस्व सुधार नहीं, बल्कि डिजिटल गवर्नेंस और जन-केंद्रित प्रशासन की एक नई सोच का प्रतीक बनकर उभरा है। यह साबित करता है कि जब तकनीक, पारदर्शिता और जमीनी प्रशासन एक साथ काम करते हैं, तब शासन का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है। आने वाले समय में यह मॉडल देश के अन्य ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

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